भारत (1800-1850): प्रमुख राजनीतिक घटनाएँ | Political Events

1. परिचय: कंपनी से साम्राज्य तक का सफर

वर्ष 1800 से 1850 का समय भारतीय इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। यह वह दौर था जब ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक संस्था से बदलकर भारत की सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति बन गई। इस आधी सदी के दौरान हुए युद्धों, संधियों, प्रशासनिक सुधारों और विद्रोहों ने भारत के भविष्य को आकार दिया और अंततः 1857 के महाविद्रोह की नींव रखी।


2. 1800 से 1850 का विस्तृत घटनाक्रम (Timeline)

इस अवधि की प्रमुख राजनीतिक, सामाजिक और सैन्य घटनाओं का वर्षवार विवरण नीचे दिया गया है:

    1800: फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना

    लॉर्ड वेलेजली ने 10 जुलाई 1800 को कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की थी। इसका मुख्य उद्देश्य भारत आने वाले नए ब्रिटिश सिविल सेवकों (नौकरशाहों) को भारतीय भाषाओं, कानूनों, इतिहास और रीति-रिवाजों का प्रशिक्षण देना था ताकि प्रशासन सुचारू रूप से चल सके। यह संस्थान हिंदी और उर्दू साहित्य (खड़ी बोली) के प्रारंभिक विकास के लिए एक ऐतिहासिक केंद्र साबित हुआ, जहाँ जॉन गिलक्रिस्ट जैसे विद्वानों ने कार्य किया। हालाँकि, लंदन स्थित कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के विरोध के कारण 1802 के बाद इसके अधिकार सीमित कर दिए गए। यह कॉलेज भारत में ब्रिटिश प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने की दिशा में पहला बड़ा कदम था।

    1801: अवध पर ब्रिटिश नियंत्रण

    गवर्नर-जनरल लॉर्ड वेलेजली की सहायक संधि नीति के तहत, अवध के नवाब सादत अली खान को 1801 में एक अत्यंत कठोर संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए विवश किया गया। इस संधि के द्वारा नवाब को अपने राज्य का लगभग आधा हिस्सा, जिसमें उपजाऊ रोहिलखंड, गोरखपुर और गंगा-यमुना दोआब के क्षेत्र शामिल थे, कंपनी को सौंपना पड़ा। यह क्षेत्र ब्रिटिश सेना के रखरखाव के बदले में लिया गया था, जिसे अवध की 'सुरक्षा' के लिए तैनात किया गया था। इस घटना ने अवध को ब्रिटिश क्षेत्रों से घेर दिया और उसकी स्वतंत्र सैन्य शक्ति को समाप्त कर दिया। यह कदम वास्तव में अवध की संप्रभुता के अंत और भविष्य में उसके पूर्ण विलय की शुरुआत थी।

    1802: बेसिन की संधि (Treaty of Bassein)

    मराठा सरदारों के आपसी संघर्ष में जसवंत राव होल्कर द्वारा पूना के युद्ध में हारने के बाद, पेशवा बाजीराव द्वितीय ने अपनी सत्ता बचाने के लिए अंग्रेजों की शरण ली। 31 दिसंबर 1802 को हुई यह संधि मराठा साम्राज्य के पतन की शुरुआत थी, क्योंकि इसके तहत पेशवा ने 'सहायक संधि' स्वीकार कर ली थी। बदले में, अंग्रेजों ने पेशवा को पूना की गद्दी वापस दिलाने का वादा किया, लेकिन मराठा साम्राज्य की विदेश नीति पूरी तरह कंपनी के अधीन हो गई। इस संधि ने शिवाजी द्वारा स्थापित 'मराठा स्वराज्य' की स्वतंत्रता को गिरवी रख दिया। अन्य मराठा सरदारों (सिंधिया और भोंसले) ने इसे राष्ट्रीय अपमान माना, जिसके परिणामस्वरूप द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध छिड़ गया।

    1803–1805: द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध

    बेसिन की संधि से अपमानित होकर सिंधिया और भोंसले ने अंग्रेजों के प्रभुत्व को चुनौती दी, जिससे यह युद्ध भड़क उठा। लॉर्ड लेक ने उत्तर भारत में और आर्थर वेलेजली (भविष्य के ड्यूक ऑफ वेलिंग्टन) ने दक्षिण में मराठा सेनाओं को असाई और लसवाड़ी के युद्धों में करारी शिकस्त दी। युद्ध के परिणामस्वरूप देवगाँव और सुरजी-अंजनगाँव की संधियाँ हुईं, जिनसे मराठों ने कटक, गंगा-यमुना दोआब और गुजरात के कई क्षेत्र खो दिए। सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह रहा कि 1803 में अंग्रेजों ने दिल्ली और आगरा पर कब्जा कर लिया और मुगल बादशाह को अपने संरक्षण में ले लिया। बाद में यशवंत राव होल्कर ने भी संघर्ष किया, लेकिन अंततः 1805 में राजघाट की संधि के साथ युद्ध समाप्त हुआ।

    1805: दिल्ली और आगरा पर ब्रिटिश नियंत्रण

    द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के परिणाम भारत के राजनीतिक भविष्य के लिए निर्णायक साबित हुए। जनरल लेक के अभियानों के कारण, 1805 तक दिल्ली और आगरा जैसे सामरिक और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण शहरों पर अंग्रेजों का पूर्ण आधिपत्य स्थापित हो गया। इस घटना का सबसे बड़ा प्रभाव मुगल सत्ता पर पड़ा; अब मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय मराठों के संरक्षण से निकलकर अंग्रेजों के संरक्षण में आ गए और कंपनी के पेंशनभोगी बन गए। दिल्ली पर 'यूनियन जैक' (ब्रिटिश झंडा) का फहराना यह संकेत था कि भारत की सर्वोच्च शक्ति अब मुगल या मराठा नहीं, बल्कि ईस्ट इंडिया कंपनी है। इसने उत्तर भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को पत्थर की तरह मजबूत कर दिया।

    1806: वेल्लोर का सिपाही विद्रोह

    10 जुलाई 1806 को मद्रास प्रेसीडेंसी के वेल्लोर किले में भारतीय सिपाहियों ने ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ पहला बड़ा सशस्त्र विद्रोह किया, जो 1857 की क्रांति की पूर्वपीठिका माना जाता है। इसका मुख्य कारण कमांडर-इन-चीफ सर जॉन क्रैडॉक द्वारा जारी नया ड्रेस कोड था, जिसमें सैनिकों को माथे पर तिलक लगाने और दाढ़ी रखने से मना किया गया था, साथ ही चमड़े की कलगी (turrah) वाली पगड़ी पहनने को कहा गया। सैनिकों ने इसे अपने धर्म और जाति पर प्रहार माना। विद्रोहियों ने किले पर कब्जा कर टीपू सुल्तान के बेटे को शासक घोषित कर दिया और कई अंग्रेज अफसरों को मार डाला। हालाँकि, अर्कोट से आए कर्नल गिलेस्पी ने बेरहमी से इस विद्रोह को कुचल दिया, जिसमें सैकड़ों भारतीय सिपाही शहीद हुए।

    1813: चार्टर एक्ट 1813

    नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था के कारण ब्रिटिश व्यापारियों की मांग को देखते हुए, ब्रिटिश संसद ने चार्टर एक्ट 1813 पारित किया। इस अधिनियम ने चाय और चीन के साथ व्यापार को छोड़कर, भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार (Trade Monopoly) समाप्त कर दिया, जिससे "मुक्त व्यापार" (Free Trade) का युग शुरू हुआ। इस एक्ट की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें पहली बार भारतीयों की शिक्षा और साहित्य के पुनरुद्धार के लिए प्रति वर्ष एक लाख रुपये खर्च करने का प्रावधान किया गया। साथ ही, इसने ईसाई मिशनरियों को भारत आकर धर्म प्रचार करने और अंग्रेजी स्कूल खोलने की आधिकारिक अनुमति दे दी। यह अधिनियम भारत के पश्चिमीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम था।

    1814–1816: आंग्ल-नेपाल युद्ध और सुगौली की संधि

    लॉर्ड हेस्टिंग्स के कार्यकाल में सीमा विवादों के कारण अंग्रेजों और नेपाल के गोरखाओं के बीच यह संघर्ष हुआ। गोरखा सेना ने अमर सिंह थापा के नेतृत्व में अद्भुत वीरता दिखाई, लेकिन जनरल ऑक्टर्लोनी की रणनीति के आगे उन्हें पीछे हटना पड़ा। 1816 में 'सुगौली की संधि' (Treaty of Sugauli) से युद्ध समाप्त हुआ, जिसके तहत नेपाल ने कुमाऊँ, गढ़वाल और सिक्किम जैसे क्षेत्र अंग्रेजों को सौंप दिए। इसी संधि से शिमला और नैनीताल जैसे हिल स्टेशन ब्रिटिश साम्राज्य को मिले और वर्तमान भारत-नेपाल सीमा तय हुई। साथ ही, अंग्रेजों ने गोरखाओं की वीरता से प्रभावित होकर उन्हें अपनी सेना में भर्ती करना शुरू किया, जो आज भी जारी है।

    1817: पाईका विद्रोह (ओडिशा)

    ओडिशा में हुआ पाईका विद्रोह ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक सशस्त्र जन-विद्रोह था, जिसका नेतृत्व खुर्दा के राजा के सेनापति बक्सी जगबंधु बिद्याधर ने किया था। यह विद्रोह अंग्रेजों की शोषणकारी भू-राजस्व नीतियों और नमक कर में वृद्धि के कारण भड़का था, जिसने पारंपरिक पाईका सैनिकों (जो मूलतः किसान थे) की आजीविका छीन ली थी। विद्रोहियों ने बानपुर और खुर्दा में सरकारी खजाने लूटे और पुलिस थानों में आग लगा दी, जिससे कुछ समय के लिए ब्रिटिश प्रशासन पूरी तरह ठप्प हो गया। हालाँकि अंग्रेजों ने इसे क्रूरतापूर्वक कुचल दिया, लेकिन आधुनिक इतिहासकार इसे 1857 से भी पहले 'स्वतंत्रता के लिए प्रथम युद्ध' के रूप में देखते हैं।

    1817–1819: तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध और मराठा पतन

    यह मराठा शक्ति और अंग्रेजों के बीच अंतिम निर्णायक युद्ध था, जिसने भारत में मराठा प्रभुत्व का सूर्य हमेशा के लिए अस्त कर दिया। गवर्नर-जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स ने पिंडारियों के दमन के बहाने मराठा सरदारों को घेरना शुरू किया, जिसके जवाब में पेशवा बाजीराव द्वितीय, भोंसले और होल्कर ने अंग्रेजों के खिलाफ अंतिम विद्रोह किया। लेकिन खिड़की, सीताबर्डी और महिदपुर की लड़ाइयों में मराठा सेना बुरी तरह पराजित हुई। इसके परिणाम अत्यंत दूरगामी थे—पेशवा का पद हमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया और बाजीराव द्वितीय को पेंशन देकर कानपुर के पास बिठूर भेज दिया गया। मराठा क्षेत्र को ब्रिटिश बॉम्बे प्रेसीडेंसी में मिला लिया गया, जिससे भारत में ब्रिटिश सर्वोच्चता निर्विवाद हो गई।

    1820 का दशक: रैयतवाड़ी व्यवस्था का विस्तार

    1820 के दशक में मद्रास के गवर्नर थॉमस मुनरो और बॉम्बे में माउंटस्टुअर्ट एल्फिंस्टन ने 'रैयतवाड़ी व्यवस्था' (Ryotwari System) को व्यापक रूप से लागू किया। स्थायी बंदोबस्त (Zamindari System) के विपरीत, इस प्रणाली में सरकार और किसानों (रैयतों) के बीच कोई बिचौलिया नहीं था; सरकार सीधे किसान से ही लगान वसूल करती थी और उसे ही भूमि का स्वामी मानती थी। अंग्रेजों का तर्क था कि दक्षिण भारत में पारंपरिक ज़मींदार नहीं थे, इसलिए यह व्यवस्था वहाँ के लिए उपयुक्त थी। हालाँकि, इसमें लगान की दरें अक्सर बहुत ऊंची (उपज का 50% तक) होती थीं और अधिकारियों द्वारा सख्ती से वसूली की जाती थी, जिससे किसानों का शोषण बढ़ा और वे महाजनों के कर्ज के जाल में फंसते चले गए।

    1824–1826: प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध और यांडूब की संधि

    लॉर्ड एमहर्स्ट के कार्यकाल में बर्मा (म्यांमार) की विस्तारवादी नीतियों और असम व मणिपुर में उनके हस्तक्षेप के कारण यह युद्ध छिड़ा। यह अंग्रेजों द्वारा भारत की पूर्वी सीमाओं पर लड़ा गया पहला बड़ा युद्ध था, जिसमें उन्हें घने जंगलों और बीमारियों के कारण भारी सैन्य और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। अंततः 1826 में 'यांडूब की संधि' (Treaty of Yandabo) के साथ युद्ध समाप्त हुआ। इस संधि के तहत बर्मा को असम, अराकान और तनासरीम के तटीय प्रांत अंग्रेजों को सौंपने पड़े और मणिपुर को स्वतंत्र मानना पड़ा। इस युद्ध ने पूर्वोत्तर भारत में ब्रिटिश प्रभुत्व की नींव रखी और बर्मा की संप्रभुता के अंत की शुरुआत की।

    1828: ब्रह्म समाज की स्थापना

    20 अगस्त 1828 को राजा राममोहन राय ने कलकत्ता में 'ब्रह्म सभा' की स्थापना की, जिसे बाद में 'ब्रह्म समाज' के नाम से जाना गया। यह भारत का पहला आधुनिक सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन था, जिसका उद्देश्य हिंदू धर्म को तर्क और वेदों के मूल ज्ञान के आधार पर शुद्ध करना था। ब्रह्म समाज ने एकेश्वरवाद (एक ईश्वर की उपासना) का प्रचार किया और मूर्ति पूजा, कर्मकांड, तथा पुरोहितवाद का कड़ा विरोध किया। इसने सती प्रथा, बाल विवाह और जाति व्यवस्था जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी आवाज उठाई। यह आंदोलन भारतीय पुनर्जागरण (Indian Renaissance) का अग्रदूत बना, जिसने भारतीयों में तार्किकता और आधुनिक विचारों का संचार किया।

    1829: सती प्रथा उन्मूलन कानून

    राजा राममोहन राय के अथक संघर्ष और मानवीय तर्कों से प्रभावित होकर, गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने 4 दिसंबर 1829 को ऐतिहासिक 'नियम 17' (Regulation XVII) पारित किया। इस कानून के तहत विधवाओं को उनके पति की चिता पर जिंदा जलाने की क्रूर सती प्रथा को अवैध और 'मानव हत्या' (Culpable Homicide) के समान दंडनीय अपराध घोषित किया गया। शुरुआत में यह केवल बंगाल प्रेसीडेंसी में लागू हुआ, लेकिन 1830 तक इसे मद्रास और बॉम्बे में भी विस्तार दे दिया गया। यह ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय सामाजिक-धार्मिक मामलों में किया गया पहला बड़ा और साहसिक हस्तक्षेप था, जिसने महिलाओं के जीवन के अधिकार को सुरक्षित किया और रूढ़िवादी धर्मसभा के विरोध को खारिज कर दिया।

    1830 का दशक: ठगी प्रथा का दमन

    लॉर्ड विलियम बेंटिक के कार्यकाल में कर्नल विलियम स्लीमन को ठगी प्रथा को समाप्त करने की विशेष जिम्मेदारी सौंपी गई थी। 'ठग' कोई साधारण चोर नहीं थे, बल्कि यह एक संगठित वंशानुगत अपराधी गिरोह था जो यात्रियों का विश्वास जीतकर उनकी रुमाल से गला घोंटकर हत्या कर देता था और लूटपाट करता था। वे इसे अक्सर धार्मिक कृत्य मानते थे। स्लीमन ने मुखबिरों का एक व्यापक जाल बिछाया और कठोर कार्रवाई करते हुए 1500 से अधिक ठगों को गिरफ्तार किया। इनमें से सैकड़ों को फाँसी दी गई और बाकी को आजीवन कारावास (काला पानी) के लिए निर्वासित कर दिया गया। इस सफल अभियान ने भारतीय राजमार्गों को यात्रियों के लिए सुरक्षित बना दिया।

    1831: कोल विद्रोह (छोटानागपुर)

    1831-32 में छोटानागपुर (वर्तमान झारखंड) के पठारी क्षेत्रों में कोल आदिवासियों (मुंडा, उरांव, हो) ने अंग्रेजों और बाहरी लोगों (दीकुओं) के खिलाफ एक संगठित विद्रोह किया। इसका मुख्य कारण उनकी पारंपरिक भूमि व्यवस्था को छीनकर बाहरी जमींदारों, व्यापारियों और साहूकारों को देना था, जो उनका भारी शोषण करते थे। बुद्धू भगत जैसे नेताओं के नेतृत्व में, विद्रोहियों ने अंग्रेजों के कानूनों को मानने से इनकार कर दिया और शोषक जमींदारों के घरों को जला दिया। यह विद्रोह इतना व्यापक और उग्र था कि इसे दबाने के लिए रामगढ़ बटालियन को बुलाना पड़ा। अंततः हजारों आदिवासियों की शहादत के बाद विद्रोह शांत हुआ, जिसके परिणामस्वरूप प्रशासन में बदलाव करते हुए 'दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी' (South-West Frontier Agency) का गठन किया गया।

    1833: चार्टर एक्ट 1833

    यह अधिनियम ब्रिटिश भारत के इतिहास में 'केंद्रीयकरण' (Centralization) का अंतिम और निर्णायक चरण था। इसके द्वारा 'बंगाल के गवर्नर-जनरल' का पदनाम बदलकर 'भारत का गवर्नर-जनरल' कर दिया गया, जिससे लॉर्ड विलियम बेंटिक भारत के पहले गवर्नर-जनरल बने। अब बॉम्बे और मद्रास के गवर्नरों की विधायी शक्तियाँ छीनकर भारत के गवर्नर-जनरल को पूरे ब्रिटिश भारत के लिए कानून बनाने का एकाधिकार दे दिया गया। साथ ही, ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों को पूरी तरह समाप्त कर उसे विशुद्ध रूप से एक प्रशासनिक निकाय बना दिया गया। इसी एक्ट के तहत कानूनों के संहिताकरण के लिए लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में पहले विधि आयोग (Law Commission) का गठन भी हुआ।

    1835: अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम (English Education Act)

    लॉर्ड मैकाले के प्रसिद्ध 'स्मरण पत्र' (Minute) के आधार पर गवर्नर-जनरल विलियम बेंटिक ने 1835 का अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम पारित किया। इस निर्णय ने भारत में प्राच्य शिक्षा (संस्कृत और फारसी) बनाम पाश्चात्य शिक्षा के विवाद को अंग्रेजी के पक्ष में समाप्त कर दिया। अब उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी बना दिया गया और सरकारी फंड को पश्चिमी विज्ञान व साहित्य के प्रचार पर खर्च करने का निर्णय लिया गया। मैकाले का उद्देश्य 'निस्पंदन सिद्धांत' (Filtration Theory) के तहत ऐसे भारतीयों का एक वर्ग तैयार करना था जो "रंग और रक्त में भारतीय हों, लेकिन विचार, नैतिकता और बुद्धि में अंग्रेज हों।" यह आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली की आधारशिला बनी।

    1839–1842: प्रथम आंग्ल-अफ़गान युद्ध (The Great Game)

    रूस के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए गवर्नर-जनरल लॉर्ड ऑकलैंड ने 'अग्रगामी नीति' (Forward Policy) अपनाई, जो ब्रिटिश इतिहास की सबसे बड़ी भूल साबित हुई। अंग्रेजों ने काबुल पर कब्जा कर अमीर दोस्त मोहम्मद को हटाकर अपने कठपुतली शाह शुजा को गद्दी पर बैठाया, लेकिन अफगानी जनता ने इसे स्वीकार नहीं किया। 1842 में हुए विद्रोह के बाद ब्रिटिश सेना को काबुल से पीछे हटना पड़ा। वापसी के दौरान बर्फीले पहाड़ों और अफगान छापामारों के हमलों में एलफिंस्टन की पूरी सेना (लगभग 16,000 सैनिक और नागरिक) नष्ट हो गई; केवल एक डॉ. ब्राइडन ही जीवित जलालाबाद पहुँच सके। इस युद्ध ने ब्रिटिश अजेयता के भ्रम को तोड़ दिया और उन्हें वापस दोस्त मोहम्मद को शासक स्वीकार करना पड़ा।

    1843: सिंध का विलय (Annexation of Sindh)

    अफगान युद्ध की विफलता के बाद अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करने के लिए, गवर्नर-जनरल लॉर्ड एलेनबरो के समय में सिंध का विलय किया गया। यद्यपि सिंध के अमीर अंग्रेजों के साथ मित्रतापूर्ण संधियों का पालन कर रहे थे, लेकिन सर चार्ल्स नेपियर ने साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा के चलते उन पर झूठे आरोप लगाकर युद्ध थोप दिया। 'मियानी' और 'दुब्बा' (हैदराबाद) की लड़ाइयों में अमीरों को हराकर 1843 में सिंध को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया। यह कार्य इतना अनैतिक था कि इसे इतिहासकार "एक शर्मनाक डकैती" मानते हैं। नेपियर ने खुद स्वीकार किया था, "हमें सिंध को जब्त करने का कोई अधिकार नहीं है, फिर भी हम ऐसा करेंगे... यह एक बहुत ही लाभदायक धूर्तता होगी।"

    1845–1846: प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध और लाहौर की संधि

    महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद पंजाब में उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने सतलज नदी के किनारे सेना जमा करनी शुरू की, जिससे युद्ध भड़क उठा। खालसा सेना ने मुदकी और फिरोजशाह की लड़ाइयों में अद्भुत वीरता का परिचय दिया और अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी। हालाँकि, लाल सिंह और तेज सिंह जैसे सेनापतियों के विश्वासघात के कारण 'सोबराओं की लड़ाई' में सिखों की निर्णायक हार हुई। परिणामस्वरुप, मार्च 1846 में 'लाहौर की संधि' हुई। इसके तहत सिखों को उपजाऊ जालंधर दोआब क्षेत्र छोड़ना पड़ा और भारी युद्ध हर्जाना न चुका पाने के कारण अंग्रेजों ने कश्मीर को गुलाब सिंह को बेच दिया (अमृतसर की संधि)।

    1848: लॉर्ड डलहौजी और व्यपगत का सिद्धांत (Doctrine of Lapse)

    1848 में भारत के सबसे युवा गवर्नर-जनरल बनकर आए लॉर्ड डलहौजी ने घोर साम्राज्यवादी नीति अपनाई, जिसे 'व्यपगत का सिद्धांत' या 'हड़प नीति' (Doctrine of Lapse) कहा गया। इस सिद्धांत के अनुसार, यदि किसी आश्रित भारतीय राज्य के शासक की मृत्यु बिना किसी सगे (प्राकृतिक) वारिस के हो जाती थी, तो उसे पुत्र गोद लेने का अधिकार नहीं था और उसका राज्य ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया जाता था। इस नीति का पहला शिकार 1848 में महाराष्ट्र का 'सतारा' राज्य बना। इसके बाद डलहौजी ने जैतपुर, संबलपुर, बघाट, उदयपुर, झाँसी और नागपुर को भी हड़प लिया। यह नीति भारतीय राजाओं के अस्तित्व के लिए सीधा खतरा बन गई और 1857 के विद्रोह का सबसे बड़ा राजनीतिक कारण बनी।

    1848–1849: द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध और पंजाब का विलय

    मुल्तान के गवर्नर मूलराज और शेर सिंह अटारीवाला के विद्रोह ने इस अंतिम युद्ध की चिंगारी भड़काई। रामनगर और विशेष रूप से 'चिलियांवाला की लड़ाई' में खालसा सेना ने अंग्रेजों को नाको चने चबवा दिए, जिससे ब्रिटिश प्रतिष्ठा को भारी धक्का लगा। लेकिन अंततः 1849 में 'गुजरात की लड़ाई' (जिसे तोपों का युद्ध भी कहा जाता है) में अंग्रेजों ने निर्णायक जीत हासिल की। इसके बाद लॉर्ड डलहौजी ने पंजाब का पूर्ण विलय ब्रिटिश साम्राज्य में कर लिया। महाराजा दलीप सिंह को पेंशन देकर इंग्लैंड भेज दिया गया और उनसे विश्व प्रसिद्ध 'कोहिनूर हीरा' लेकर ब्रिटिश ताज को सौंप दिया गया। इसके साथ ही रणजीत सिंह के साम्राज्य का सूर्य अस्त हो गया।

    1849: पंजाब का विलय और सीमा विस्तार

    29 मार्च 1849 को लॉर्ड डलहौजी ने एक घोषणा पत्र जारी कर पंजाब को औपचारिक रूप से ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बना लिया। इसके प्रशासन के लिए तीन सदस्यों का एक 'प्रशासनिक बोर्ड' (Board of Administration) गठित किया गया, जिसमें हेनरी लॉरेंस और जॉन लॉरेंस प्रमुख थे। इस विलय का भू-राजनीतिक महत्व बहुत अधिक था क्योंकि अब ब्रिटिश साम्राज्य की सीमाएँ भारत की प्राकृतिक 'उत्तर-पश्चिमी सीमा' (सुलेमान पर्वत श्रृंखला और खैबर दर्रा) तक पहुँच गई थीं। इसने अंग्रेजों को मध्य एशिया की राजनीति में सीधा हस्तक्षेप करने की शक्ति दी। यह भारत में ब्रिटिश क्षेत्रीय विस्तार (Territorial Expansion) का अंतिम बड़ा चरण था, जिसके बाद लगभग पूरा भारत 'गुलाबी' (ब्रिटिश नक्शे का रंग) हो गया।

    1850: लेक्स लोकी अधिनियम (Lex Loci Act)

    लॉर्ड डलहौजी के कार्यकाल में पारित यह अधिनियम (Act XXI of 1850) सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत विवादास्पद था। इसे 'जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम' (Caste Disabilities Removal Act) भी कहा जाता है। हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अपना धर्म बदलता था, तो वह अपनी पैतृक संपत्ति से वंचित हो जाता था। इस कानून ने उस नियम को समाप्त कर दिया और व्यवस्था दी कि धर्म परिवर्तन करने पर भी व्यक्ति का अपनी पुश्तैनी जायदाद पर अधिकार बना रहेगा। इसका सीधा लाभ ईसाई मिशनरियों को मिला, जिससे धर्मांतरण आसान हो गया। रूढ़िवादी भारतीयों ने इसे अपने धर्म और समाज पर सीधा प्रहार माना, जिसने 1857 की क्रांति के लिए बारूद इकट्ठा करने का काम किया।

3. इस काल की मुख्य विशेषताएँ

  • राजनीतिक एकीकरण: ब्रिटिशों ने मराठा, सिख और अन्य शक्तियों को हराकर लगभग पूरे भारत पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित कर लिया।
  • सामाजिक सुधार: सती प्रथा पर रोक, ठगी का अंत और अंग्रेजी शिक्षा की शुरुआत से भारतीय समाज में आधुनिकता और सुधारवाद का दौर शुरू हुआ।
  • आर्थिक बदलाव: भू-राजस्व की नई प्रणालियों (रैयतवाड़ी, महालवाड़ी) ने पारंपरिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बदल दिया।
  • विद्रोह के बीज: डलहौजी की विलय नीति और सामाजिक हस्तक्षेप ने भारतीयों में असंतोष पैदा किया, जो आगे चलकर 1857 की क्रांति का कारण बना।

4. निष्कर्ष

1800 से 1850 का कालखंड भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के सुदृढ़ीकरण का युग था। जहाँ एक तरफ अंग्रेजी शिक्षा और प्रशासनिक एकता ने आधुनिक भारत की नींव रखी, वहीं दूसरी तरफ आर्थिक शोषण और आक्रामक विस्तारवादी नीतियों ने व्यापक जन-असंतोष को जन्म दिया। यह काल भारत के इतिहास में मध्यकाल से आधुनिक काल की ओर संक्रमण का एक महत्वपूर्ण चरण था।

📜 भारत के संविधान और राजनीति से जुड़ी सभी पोस्ट देखें

संविधान के अनुच्छेद, संशोधन, भाग, अनुसूचियाँ और भारतीय राजनीति के हर विषय पर विस्तृत जानकारी — सब कुछ एक ही जगह।

🔗 सम्पूर्ण Sitemap देखें

© PrashnaPedia | भारतीय संविधान और राजनीति ज्ञानकोश

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ