चौरी-चौरा कांड: इतिहास, कारण और असहयोग आंदोलन की अचानक समाप्ति

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास कई महत्वपूर्ण पड़ावों से भरा है, लेकिन 1922 का 'चौरी-चौरा कांड' एक ऐसी निर्णायक घटना है जिसने पूरे आंदोलन की दिशा बदल दी। यह वह समय था जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में 'असहयोग आंदोलन' अपने चरम पर था, देश में अभूतपूर्व एकता थी और अंग्रेजी हुकूमत दबाव में थी। लेकिन, गोरखपुर के एक छोटे से कस्बे में हुई एक हिंसक घटना ने गांधीजी को इतना आहत किया कि उन्होंने पूरे देश में चल रहे इस विशाल आंदोलन को तत्काल वापस लेने की घोषणा कर दी।

आखिर 4 फरवरी 1922 को चौरी-चौरा में ऐसा क्या हुआ था? गांधीजी ने लाखों लोगों की उम्मीदों और जोश से भरे आंदोलन को एक स्थानीय घटना के कारण क्यों रोक दिया? इस लेख में हम चौरी-चौरा कांड का गहराई से विश्लेषण करेंगे और समझेंगे कि कैसे इस घटना ने असहयोग आंदोलन की समाप्ति की पटकथा लिखी।

1922 के चौरी-चौरा कांड का प्रतीकात्मक दृश्य, जहां गुस्साई भीड़ द्वारा पुलिस थाने में आग लगाई गई


असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि (1920-1922)

असहयोग आंदोलन (1920–1922) के दौरान विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार, चरखा कातते लोग और नेतृत्व करते महात्मा गांधी का प्रतीकात्मक दृश्य


1919 के जलियांवाला बाग नरसंहार और रॉलेट एक्ट के दमनकारी प्रावधानों ने भारतीय जनता में ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारी आक्रोश भर दिया था। इसी समय, तुर्की के खलीफा के समर्थन में भारतीय मुसलमानों द्वारा 'खिलाफत आंदोलन' भी चलाया जा रहा था। महात्मा गांधी ने इसे हिंदू-मुस्लिम एकता का एक सुनहरा अवसर माना और 1920 में 'असहयोग आंदोलन' का आह्वान किया।

इस आंदोलन के मुख्य बिंदु थे:

  • सरकारी उपाधियों और सम्मानों को लौटाना।
  • सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और अदालतों का बहिष्कार करना।
  • विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना और स्वदेशी अपनाना (विशेषकर चरखा और खादी)।
  • सरकारी नौकरियों से इस्तीफा देना।

यह आंदोलन अभूतपूर्व रूप से सफल रहा। पूरे देश में लाखों छात्रों ने स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए, वकीलों ने अपनी प्रैक्टिस बंद कर दी और विदेशी कपड़ों की होलियां जलाई गईं। पूरा देश 'स्वराज' के नारे से गूंज रहा था। लेकिन इस पूरे आंदोलन की नींव एक ही सिद्धांत पर टिकी थी - 'अहिंसा' (Non-Violence) । गांधीजी ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि किसी भी परिस्थिति में हिंसा का सहारा नहीं लिया जाएगा।

चौरी-चौरा कांड: 4 फरवरी 1922 का घटनाक्रम

चौरी-चौरा, संयुक्त प्रांत (आज का उत्तर प्रदेश) के गोरखपुर जिले का एक छोटा सा कस्बा था। असहयोग आंदोलन के हिस्से के रूप में, 4 फरवरी 1922 को (कुछ स्रोतों में 5 फरवरी भी कहा जाता है, लेकिन आधिकारिक तौर पर 4 फरवरी) लगभग 2,000 से 2,500 स्वयंसेवकों और प्रदर्शनकारियों का एक जुलूस स्थानीय बाजार से गुजर रहा था। वे बढ़ती कीमतों और शराब की बिक्री के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे।

घटना की शुरुआत

जुलूस का नेतृत्व भगवान अहीर नामक एक स्थानीय नेता कर रहे थे। जब जुलूस थाने के सामने से गुजरा, तो पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज करने का प्रयास किया और कुछ नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इसके जवाब में, भीड़ उत्तेजित हो गई और पुलिस के साथ झड़प शुरू हो गई। पुलिस ने पहले चेतावनी के तौर पर हवाई फायरिंग की, लेकिन जब भीड़ तितर-बितर नहीं हुई, तो उन्होंने सीधे प्रदर्शनकारियों पर गोली चला दी, जिससे कुछ लोगों की मौत हो गई।

हिंसक प्रतिक्रिया

पुलिस की गोलीबारी से भीड़ का गुस्सा भड़क उठा। प्रदर्शनकारी अब 'सत्याग्रही' नहीं रहे, वे एक हिंसक भीड़ में तब्दील हो गए। उन्होंने पुलिसकर्मियों पर पथराव शुरू कर दिया। गोलियां खत्म होने और संख्या में कम होने के कारण, पुलिसकर्मी घबराकर थाने के अंदर भाग गए और खुद को बचाने के लिए दरवाजा बंद कर लिया।

क्रोधित भीड़ ने बदला लेने का फैसला किया। उन्होंने बाहर से थाने को घेर लिया और उसमें आग लगा दी। जो पुलिसकर्मी जलते हुए थाने से बाहर भागने की कोशिश कर रहे थे, उन्हें भीड़ ने पकड़कर वापस आग में फेंक दिया या पीट-पीटकर मार डाला। इस वीभत्स घटना में 22 (कुछ रिपोर्टों के अनुसार 23) पुलिसकर्मियों की जलकर या हिंसक रूप से मौत हो गई।

गांधीजी की तत्काल प्रतिक्रिया और उपवास

जब इस हिंसक घटना की खबर महात्मा गांधी तक पहुंची, तो वे स्तब्ध और गहरे सदमे में चले गए। उन्हें लगा कि उन्होंने लोगों को 'अहिंसक सत्याग्रह' का जो पाठ पढ़ाया था, वे उसमें विफल हो गए हैं। उनका मानना था कि जिस आंदोलन की नींव ही 'अहिंसा' पर टिकी हो, उसमें ऐसी 'हिंसा' के लिए कोई जगह नहीं हो सकती।

गांधीजी ने इस घटना को "दैवीय चेतावनी" माना। उन्हें लगा कि देश अभी 'स्वराज' के लिए तैयार नहीं है, क्योंकि लोग अभी भी अहिंसा के मूल मंत्र को समझ नहीं पाए हैं। उन्होंने इस हिंसा के प्रायश्चित के रूप में तुरंत पांच दिन का उपवास शुरू कर दिया।

असहयोग आंदोलन की समाप्ति: बारदोली प्रस्ताव

गांधीजी केवल उपवास पर ही नहीं रुके। उन्होंने एक ऐसा निर्णय लिया जिसने पूरे देश को चकित कर दिया। 12 फरवरी 1922 को, कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक गुजरात के बारदोली में बुलाई गई।

"गांधीजी ने तर्क दिया कि यदि वह इस तरह की हिंसक भीड़ के हाथों में 'स्वराज' की बागडोर सौंप देते हैं, तो यह वास्तविक स्वराज नहीं होगा, बल्कि 'भीड़तंत्र' (Mobocracy) होगा।"

बारदोली में, गांधीजी ने कांग्रेस को 'असहयोग आंदोलन' को तत्काल समाप्त करने के लिए राजी कर लिया। 'बारदोली प्रस्ताव' पारित किया गया, जिसने सभी सविनय अवज्ञा गतिविधियों को रोक दिया। यह उस समय हुआ जब आंदोलन अपने चरम पर था और ब्रिटिश राज पर भारी दबाव था। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसकी कई लोगों ने सराहना की तो कई ने आलोचना भी की। बाद के महत्वपूर्ण घटनाक्रमों, जैसे क्रिप्स मिशन (1942) ने भी यह दर्शाया कि स्वतंत्रता का मार्ग कितना लंबा था।

गांधीजी के निर्णय की आलोचना क्यों हुई?

असहयोग आंदोलन को अचानक वापस लेने के गांधीजी के फैसले से हर कोई सहमत नहीं था। कई राष्ट्रवादी नेता, जो उस समय जेल में थे, इस फैसले से बेहद नाराज और निराश हुए।

  • मोतीलाल नेहरू और सी.आर. दास: इन नेताओं ने जेल से गांधीजी को पत्र लिखकर अपना विरोध जताया। उनका तर्क था कि "कन्याकुमारी के एक गांव ने अगर अहिंसा का पालन नहीं किया, तो इसकी सजा हिमालय के एक गांव को क्यों मिलनी चाहिए?" उनका मानना था कि एक स्थानीय घटना के लिए पूरे देश को दंडित करना अनुचित था।
  • सुभाष चंद्र बोस: उन्होंने इस फैसले को "राष्ट्रीय दुर्भाग्य" (national calamity) करार दिया। उनका मानना था कि जब जनता का उत्साह चरम पर था, तब पीछे हटने का आदेश देना रणनीतिक रूप से बहुत बड़ी भूल थी।
  • युवा क्रांतिकारी: इस फैसले से कई युवा निराश हो गए और उनका गांधीवादी तरीकों से मोहभंग हो गया। उन्हें लगा कि केवल 'अहिंसा' से आजादी नहीं मिल सकती, और उनमें से कई भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों के साथ जुड़ गए।

आलोचकों का मुख्य बिंदु यह था कि गांधीजी ने एक राजनीतिक आंदोलन को एक आध्यात्मिक प्रयोग बना दिया था, जहां नैतिकता को राजनीतिक लाभ से ऊपर रखा गया।

चौरी-चौरा कांड के दीर्घकालिक परिणाम

इस घटना और आंदोलन की वापसी के कई दूरगामी परिणाम हुए:

  1. गांधीजी की गिरफ्तारी: आंदोलन वापस लेने के बाद, ब्रिटिश सरकार को मौका मिल गया। 10 मार्च 1922 को, गांधीजी को राजद्रोह (sedition) के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें 6 साल की कैद की सजा सुनाई गई (हालांकि उन्हें 1924 में स्वास्थ्य कारणों से रिहा कर दिया गया)।
  2. चौरी-चौरा मुकदमा: ब्रिटिश सरकार ने इस घटना के लिए कठोर दंड दिया। सैकड़ों लोगों पर मुकदमा चलाया गया। 19 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई (जिन्हें बाद में भुला दिया गया) और कई को लंबी जेल की सजा (काला पानी) दी गई।
  3. स्वराज पार्टी का उदय: कांग्रेस के भीतर गांधीजी के फैसले से असहमत नेताओं, जैसे सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने 1923 में 'स्वराज पार्टी' का गठन किया। उनका उद्देश्य 'असहयोग' के बजाय परिषदों में प्रवेश कर (चुनाव लड़कर) सरकार के काम में बाधा डालना था। यह भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण विकास था, जैसा कि बाद में नेहरू रिपोर्ट (1928) जैसी घटनाओं से स्पष्ट हुआ।
  4. आंदोलन का बिखरना: आंदोलन के अचानक रुकने से जो राष्ट्रव्यापी एकता (विशेषकर हिंदू-मुस्लिम एकता) बनी थी, वह बिखरने लगी।

विश्लेषण: क्या गांधीजी का निर्णय सही था?

यह इतिहास का एक ऐसा प्रश्न है जिस पर आज भी बहस होती है।

निर्णय के पक्ष में तर्क:

गांधीजी का दृष्टिकोण विशुद्ध रूप से नैतिक और रणनीतिक था।

  • नैतिक आधार: उनका मानना था कि 'साधन' उतने ही पवित्र होने चाहिए जितना कि 'साध्य'। यदि 'स्वराज' (साध्य) हिंसा (साधन) के माध्यम से प्राप्त होता, तो वह सच्चा स्वराज नहीं होता।
  • रणनीतिक आधार: गांधीजी जानते थे कि भारतीय जनता हथियारों के मामले में ब्रिटिश सेना का मुकाबला नहीं कर सकती। 'अहिंसा' ही उनका सबसे बड़ा हथियार था। यदि आंदोलन हिंसक हो जाता, तो ब्रिटिश गवर्नर-जनरल और उनकी सेना को क्रूरतापूर्वक दमन करने का खुला बहाना मिल जाता, जैसा कि उन्होंने जलियांवाला बाग में किया था। वे हजारों लोगों को गोली मार देते और आंदोलन को कुचल दिया जाता।
  • भविष्य की तैयारी: गांधीजी को एहसास हुआ कि उन्होंने जनता को 'सत्याग्रह' के लिए पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित नहीं किया था। उन्होंने आंदोलन को रोककर, रचनात्मक कार्यों (जैसे खादी, चरखा, छुआछूत मिटाना) पर ध्यान केंद्रित किया, ताकि भविष्य के आंदोलनों के लिए एक मजबूत और अनुशासित आधार तैयार किया जा सके।

निर्णय के विपक्ष में तर्क:

  • खोया हुआ अवसर: आलोचकों का कहना है कि 1922 में आजादी बहुत करीब थी। आंदोलन ने सरकार को लगभग पंगु बना दिया था। इस निर्णय ने उस गति को तोड़ दिया और स्वतंत्रता संग्राम को कई साल पीछे धकेल दिया।
  • जनता का मनोबल टूटना: इस फैसले से लाखों स्वयंसेवकों का मनोबल टूट गया, जिन्होंने अपनी पढ़ाई, नौकरी और सब कुछ दांव पर लगा दिया था।

निष्कर्ष

चौरी-चौरा कांड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में केवल एक हिंसक घटना नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण वैचारिक मोड़ था। इसने यह परिभाषित किया कि भारत की आजादी का रास्ता 'हिंसा' से नहीं, बल्कि गांधीवादी 'अहिंसा' से होकर गुजरेगा। हालांकि उस समय गांधीजी के फैसले की भारी आलोचना हुई, लेकिन इसने यह सुनिश्चित किया कि आंदोलन का नैतिक आधार मजबूत बना रहे।

इस घटना ने गांधीजी को एक 'मास लीडर' से एक 'सिद्धांतवादी लीडर' के रूप में स्थापित किया, जो लोकप्रियता के बजाय अपने सिद्धांतों के प्रति अधिक प्रतिबद्ध थे। भले ही चौरी-चौरा के कारण असहयोग आंदोलन विफल हो गया, लेकिन इसने भविष्य के 'सविनय अवज्ञा आंदोलन' (1930) और 'भारत छोड़ो आंदोलन' (1942) के लिए एक अधिक अनुशासित और मजबूत नींव रखी, जिसने अंततः भारत को संविधान निर्माण और पूर्ण स्वतंत्रता की ओर अग्रसर किया।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: चौरी-चौरा कांड कब और कहाँ हुआ था?

उत्तर: चौरी-चौरा कांड 4 फरवरी 1922 को ब्रिटिश भारत के संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा कस्बे में हुआ था।

प्रश्न 2: चौरी-चौरा कांड में कितने लोग मारे गए थे?

उत्तर: इस हिंसक घटना में, गुस्साई भीड़ ने एक पुलिस थाने में आग लगा दी, जिससे 22 (या 23) पुलिसकर्मियों की मौत हो गई। इससे पहले पुलिस की गोलीबारी में कुछ प्रदर्शनकारी भी मारे गए थे।

प्रश्न 3: गांधीजी ने असहयोग आंदोलन क्यों वापस लिया?

उत्तर: गांधीजी ने चौरी-चौरा कांड में हुई हिंसा के कारण असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। उनका आंदोलन पूरी तरह से 'अहिंसा' के सिद्धांत पर आधारित था, और इस घटना ने उन्हें विश्वास दिलाया कि देश अभी अहिंसक सत्याग्रह के लिए तैयार नहीं है।

प्रश्न 4: असहयोग आंदोलन कब शुरू हुआ था?

उत्तर: असहयोग आंदोलन आधिकारिक तौर पर 1 अगस्त 1920 को महात्मा गांधी द्वारा शुरू किया गया था।

प्रश्न 5: चौरी-चौरा कांड के बाद गांधीजी को क्या सजा हुई?

उत्तर: आंदोलन वापस लेने के बाद, ब्रिटिश सरकार ने 10 मार्च 1922 को गांधीजी को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। उन पर मुकदमा चला और उन्हें 6 साल की जेल की सजा सुनाई गई।

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