भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अनगिनत बलिदानों और आंदोलनों से भरा पड़ा है। लेकिन, 1920 में शुरू हुआ असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) अपने आप में अनूठा था। यह पहला ऐसा राष्ट्रव्यापी जन आंदोलन था जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिलाकर रख दिया था। महात्मा गांधी के नेतृत्व में, यह आंदोलन केवल राजनीतिक आज़ादी के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और नैतिक उत्थान का भी प्रतीक बन गया।
इस आंदोलन के दो प्रमुख हथियार थे- 'विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार' और 'नागरिक अवज्ञा' (Civil Disobedience)। यह एक ऐसा आह्वान था जिसने आम भारतीय को स्वतंत्रता संग्राम से सीधे तौर पर जोड़ दिया। इस लेख में, हम असहयोग आंदोलन के हर पहलू की गहराई से पड़ताल करेंगे- इसके कारण क्या थे, यह कैसे फैला, बहिष्कार और स्वदेशी का क्या मतलब था, और इसे अचानक क्यों रोकना पड़ा।
विषय सूची (Table of Contents)
- 1. असहयोग आंदोलन क्या था? (What was the Non-Cooperation Movement?)
- 2. असहयोग आंदोलन के प्रमुख कारण
- 3. आंदोलन के दो मुख्य स्तंभ: बहिष्कार और स्वदेशी
- 4. नागरिक अवज्ञा का स्वरूप
- 5. आंदोलन का राष्ट्रव्यापी प्रसार और प्रगति
- 6. चौरी चौरा कांड (1922): आंदोलन का हिंसक अंत
- 7. गांधीजी ने आंदोलन वापस क्यों लिया?
- 8. असहयोग आंदोलन के परिणाम और दीर्घकालिक प्रभाव
- 9. निष्कर्ष
- 10. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. असहयोग आंदोलन क्या था? (What was the Non-Cooperation Movement?)
असहयोग आंदोलन, जो औपचारिक रूप से 1 अगस्त 1920 को शुरू हुआ, महात्मा गांधी द्वारा ब्रिटिश शासन के खिलाफ चलाया गया एक शांतिपूर्ण और अहिंसक विरोध था। 'असहयोग' का मूल विचार यह था कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही चल रहा था। यदि भारतीय लोग स्कूलों, कॉलेजों, अदालतों, सरकारी नौकरियों और विदेशी वस्तुओं का उपयोग करने से इनकार कर दें, तो यह शासन अपने आप ढह जाएगा।
इसका मुख्य उद्देश्य 'स्वराज' (स्व-शासन) प्राप्त करना था। यह पहली बार था कि कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन के भीतर सुधारों की अपनी पुरानी मांग को छोड़कर पूर्ण 'स्वराज' को अपना लक्ष्य बनाया, भले ही उसकी परिभाषा उस समय स्पष्ट नहीं थी। यह आंदोलन सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित था।
2. असहयोग आंदोलन के प्रमुख कारण
यह आंदोलन किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि कई वर्षों से जमा हो रहे असंतोष का एक विस्फोट था। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
2.1. रॉलेट एक्ट (1919)
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, ब्रिटिश सरकार ने भारत की रक्षा के नाम पर दमनकारी शक्तियाँ लागू की थीं। युद्ध के बाद, भारतीयों को उम्मीद थी कि उन्हें अधिक स्वायत्तता मिलेगी। इसके विपरीत, सरकार ने रॉलेट एक्ट लागू कर दिया। इस कानून ने सरकार को किसी भी व्यक्ति को केवल संदेह के आधार पर बिना मुकदमा चलाए दो साल तक जेल में डालने का अधिकार दे दिया। इसे "बिना वकील, बिना अपील, बिना दलील" का काला कानून कहा गया और इसका राष्ट्रव्यापी विरोध हुआ।
2.2. जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919)
रॉलेट एक्ट के विरोध में 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक शांतिपूर्ण सभा हो रही थी। जनरल डायर के आदेश पर, ब्रिटिश सैनिकों ने निहत्थे पुरुषों, महिलाओं और बच्चों पर गोलियां चलाईं, जिससे हजारों लोग मारे गए या घायल हुए। इस जघन्य हत्याकांड ने पूरे देश को झकझोर दिया और ब्रिटिश न्याय में रहे-सहे विश्वास को भी खत्म कर दिया। सरकार की हंटर कमेटी ने जनरल डायर को मामूली सज़ा देकर बरी कर दिया, जिसने आग में घी डालने का काम किया।
2.3. खिलाफत आंदोलन
प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की हार के बाद, अंग्रेजों ने वहां के खलीफा (जो दुनिया भर के सुन्नियों के आध्यात्मिक नेता माने जाते थे) की शक्तियों को समाप्त करने का निर्णय लिया। इससे भारतीय मुसलमान बहुत क्रोधित थे। गांधीजी ने इसे हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने और मुसलमानों को राष्ट्रीय आंदोलन में लाने के एक अवसर के रूप में देखा। उन्होंने खिलाफत आंदोलन को असहयोग आंदोलन के साथ जोड़ दिया, जिससे आंदोलन का जनाधार अभूतपूर्व रूप से बढ़ गया।
2.4. प्रथम विश्व युद्ध के बाद आर्थिक कठिनाइयाँ
युद्ध के कारण भारत की आर्थिक स्थिति चरमरा गई थी। कीमतें आसमान छू रही थीं, करों का बोझ बढ़ गया था और आम आदमी का जीवनयापन मुश्किल हो गया था। किसान और मजदूर वर्ग ब्रिटिश सरकार की आर्थिक नीतियों से त्रस्त थे और बदलाव के लिए बेताब थे।
3. आंदोलन के दो मुख्य स्तंभ: बहिष्कार और स्वदेशी
असहयोग आंदोलन का कार्यक्रम स्पष्ट और सीधा था। इसे दो भागों में बांटा गया था: नकारात्मक (बहिष्कार) और सकारात्मक (स्वदेशी)।
3.1. विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार: एक आर्थिक चोट
यह आंदोलन का सबसे लोकप्रिय और दृश्यमान पहलू था। 'विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार' केवल एक नारा नहीं था, यह ब्रिटिश अर्थव्यवस्था पर सीधी चोट थी। मैनचेस्टर और लंकाशायर के मिलों में बने कपड़े भारत में सस्ते बेचे जाते थे, जिसने भारतीय हथकरघा उद्योग को नष्ट कर दिया था।
गांधीजी के आह्वान पर, लोगों ने अपने घरों से विदेशी कपड़े निकालकर उनकी होली जलाना शुरू कर दिया। यह एक प्रतीकात्मक कार्य था जो ब्रिटिश शासन की सामग्री और प्रतीकों को अस्वीकार करने का प्रतीक था। व्यापारियों ने विदेशी सामानों में व्यापार करने से इनकार कर दिया। इस बहिष्कार का इतना गहरा असर हुआ कि 1920 से 1922 के बीच विदेशी कपड़े का आयात लगभग आधा रह गया।
3.2. संस्थागत बहिष्कार: शिक्षा और न्याय का त्याग
आंदोलन का दूसरा पहलू ब्रिटिश सरकार द्वारा संचालित संस्थाओं का बहिष्कार करना था:
- शैक्षिक बहिष्कार: हजारों छात्रों ने सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को छोड़ दिया। उनके लिए काशी विद्यापीठ, गुजरात विद्यापीठ और जामिया मिलिया इस्लामिया जैसे राष्ट्रीय शिक्षण संस्थानों की स्थापना की गई।
- न्यायिक बहिष्कार: मोतीलाल नेहरू, सी.आर. दास, वल्लभभाई पटेल और सी. राजगोपालाचारी जैसे कई प्रमुख वकीलों ने अपनी आकर्षक प्रैक्टिस छोड़ दी। विवादों को निपटाने के लिए राष्ट्रीय पंचायतों की स्थापना की गई।
- सरकारी नौकरियों और उपाधियों का त्याग: कई भारतीयों ने अपनी सरकारी नौकरियां छोड़ दीं और ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई 'राय बहादुर' या 'सर' जैसी उपाधियाँ लौटा दीं।
3.3. स्वदेशी का प्रचार: चरखा और खादी
बहिष्कार का नकारात्मक पहलू तब तक सफल नहीं हो सकता था जब तक उसका कोई सकारात्मक विकल्प न हो। यह विकल्प था 'स्वदेशी'। गांधीजी ने चरखे को आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया।
घर-घर में चरखा चलाया जाने लगा और खादी पहनना देशभक्ति का प्रतीक बन गया। खादी सिर्फ एक कपड़ा नहीं था; यह ब्रिटेन पर आर्थिक निर्भरता को तोड़ने और ग्रामीण भारत को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का एक माध्यम था।
4. नागरिक अवज्ञा का स्वरूप
यद्यपि 1930 में 'सविनय अवज्ञा आंदोलन' (Civil Disobedience Movement) एक अलग आंदोलन के रूप में आया, लेकिन 'नागरिक अवज्ञा' के तत्व असहयोग आंदोलन में भी गहराई से मौजूद थे। इसका मतलब था अन्यायपूर्ण कानूनों को शांतिपूर्वक तोड़ना।
"अन्यायपूर्ण कानून का पालन करना स्वयं अन्याय करने के समान है।" - महात्मा गांधी
इस चरण में, लोगों को करों का भुगतान न करने के लिए प्रोत्साहित किया गया, विशेषकर किसानों को। यह आंदोलन का सबसे आक्रामक चरण होने वाला था। गांधीजी ने सूरत के बारडोली में 'कर न अदायगी' अभियान शुरू करने की योजना बनाई थी, लेकिन इससे पहले ही चौरी चौरा की घटना घट गई।
5. आंदोलन का राष्ट्रव्यापी प्रसार और प्रगति
असहयोग आंदोलन की सफलता अभूतपूर्व थी। यह शहरों से निकलकर गांवों और कस्बों तक पहुंच गया।
- छात्र और युवा: छात्रों ने इस आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाई, जिन्होंने स्कूलों और कॉलेजों का बहिष्कार किया।
- महिलाएं: महिलाओं ने पहली बार बड़ी संख्या में घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर आंदोलन में भाग लिया। उन्होंने शराब की दुकानों और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरना दिया और जुलूसों में भाग लिया।
- किसान और मजदूर: अवध (यूपी) में किसानों का आंदोलन, असम में चाय बागान मजदूरों की हड़तालें और मिदनापुर (बंगाल) में कर-विरोधी अभियान, सभी असहयोग की व्यापक धारा में शामिल हो गए।
सरकार ने दमन का सहारा लिया। गांधीजी और मुहम्मद अली जौहर को छोड़कर लगभग सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। दिसंबर 1921 तक 30,000 से अधिक लोगों को जेल में डाल दिया गया था।
6. चौरी चौरा कांड (1922): आंदोलन का हिंसक अंत
जब आंदोलन अपने चरम पर था, तब 4 फरवरी 1922 को (कुछ स्रोतों में 5 फरवरी) उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी चौरा नामक स्थान पर एक दुखद घटना घटी। पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों के एक शांतिपूर्ण जुलूस पर लाठीचार्ज और गोलीबारी करने से भीड़ हिंसक हो गई।
क्रोधित भीड़ ने पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी जिंदा जल गए।
7. गांधीजी ने आंदोलन वापस क्यों लिया?
चौरी चौरा की हिंसक घटना से गांधीजी को गहरा आघात लगा। उनका मानना था कि देश अभी अहिंसक सत्याग्रह के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं है। उन्हें डर था कि यदि आंदोलन हिंसक हो गया, तो ब्रिटिश सरकार को क्रूर दमन का बहाना मिल जाएगा, जिससे हजारों निर्दोष लोग मारे जाएंगे।
सत्य और अहिंसा गांधीजी के लिए 'स्वराज' से भी अधिक महत्वपूर्ण थे। उन्होंने तुरंत आंदोलन को रोकने का आह्वान किया। 12 फरवरी 1922 को बारडोली में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई और असहयोग आंदोलन को आधिकारिक तौर पर वापस ले लिया गया।
कई राष्ट्रवादी नेताओं जैसे मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपत राय और सुभाष चंद्र बोस ने गांधीजी के इस फैसले की कड़ी आलोचना की। उनका मानना था कि जब आंदोलन चरम पर था, तब उसे वापस लेना एक "राष्ट्रीय आपदा" थी। हालांकि, गांधीजी अपने फैसले पर अडिग रहे। इसके तुरंत बाद, 10 मार्च 1922 को गांधीजी को गिरफ्तार कर लिया गया और 6 साल की कैद की सजा सुनाई गई।
8. असहयोग आंदोलन के परिणाम और दीर्घकालिक प्रभाव
भले ही असहयोग आंदोलन अपने तात्कालिक लक्ष्य 'स्वराज' को प्राप्त किए बिना समाप्त हो गया, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी थे:
- कांग्रेस का जनाधार बढ़ना: यह आंदोलन कांग्रेस को शिक्षित, शहरी अभिजात वर्ग के एक छोटे समूह से निकालकर एक राष्ट्रव्यापी जन संगठन में बदल दिया। अब किसान, मजदूर, कारीगर और महिलाएं सभी इसका हिस्सा थे।
- राष्ट्रीय चेतना का प्रसार: 'स्वराज', 'स्वदेशी' और 'बहिष्कार' जैसे शब्द घर-घर पहुंच गए। इसने लोगों के मन से ब्रिटिश शासन के भय को काफी हद तक कम कर दिया।
- हिंदू-मुस्लिम एकता: खिलाफत को असहयोग के साथ जोड़कर, इस आंदोलन ने हिंदू-मुस्लिम एकता का एक अभूतपूर्व प्रदर्शन किया, जो बाद के वर्षों में कम ही देखने को मिला।
- आत्मनिर्भरता का पाठ: इसने भारतीयों को आत्मनिर्भरता और आत्म-सम्मान का पाठ पढ़ाया। राष्ट्रीय शिक्षण संस्थानों और पंचायतों की स्थापना ने ब्रिटिश संस्थाओं का एक व्यवहार्य विकल्प प्रस्तुत किया।
- भविष्य के आंदोलनों की नींव: इस आंदोलन ने 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया। यह स्वतंत्रता संग्राम का एक "प्रशिक्षण शिविर" साबित हुआ।
यह आंदोलन इस बात का प्रमाण था कि ब्रिटिश गवर्नर-जनरल और उनका विशाल तंत्र भी एकजुट, अहिंसक भारतीयों के सामने असहाय हो सकता है।
9. निष्कर्ष
असहयोग आंदोलन (1920-22) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक निर्णायक अध्याय था। यह एक विफलता नहीं थी, बल्कि एक रणनीतिक विराम था। इसने पहली बार पूरे देश को एक झंडे के नीचे एकजुट किया और यह साबित कर दिया कि अहिंसा, बहिष्कार और नागरिक अवज्ञा शक्तिशाली हथियार हो सकते हैं।
भले ही चौरी चौरा की घटना के कारण इसे समय से पहले समाप्त करना पड़ा, लेकिन इसने जो राष्ट्रीय चेतना की ज्वाला जलाई, वह बुझी नहीं। इसने स्वतंत्रता के लिए भविष्य के संघर्षों, जैसे क्रिप्स मिशन (1942) की विफलता के बाद के आंदोलनों का मार्ग प्रशस्त किया और अंततः उस संविधान निर्माण की प्रक्रिया को जन्म दिया जिसने भारत को एक संप्रभु गणराज्य बनाया।
10. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: असहयोग आंदोलन कब शुरू हुआ और कब समाप्त हुआ?
उत्तर: असहयोग आंदोलन औपचारिक रूप से 1 अगस्त 1920 को शुरू हुआ था और 12 फरवरी 1922 को चौरी चौरा कांड के बाद महात्मा गांधी द्वारा इसे वापस ले लिया गया था।
प्रश्न 2: असहयोग आंदोलन का मुख्य उद्देश्य क्या था?
उत्तर: इसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासन के प्रति 'असहयोग' करके 'स्वराज' (स्व-शासन) प्राप्त करना था। इसके साथ ही, जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए न्याय और खिलाफत के मुद्दे का समाधान भी इसके लक्ष्यों में शामिल था।
प्रश्न 3: चौरी चौरा कांड क्या था?
उत्तर: 4 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा में, प्रदर्शनकारियों की एक हिंसक भीड़ ने एक पुलिस थाने में आग लगा दी, जिससे 22 पुलिसकर्मियों की मौत हो गई। यह घटना असहयोग आंदोलन के 'अहिंसा' के सिद्धांत के खिलाफ थी।
प्रश्न 4: असहयोग और सविनय अवज्ञा में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: 'असहयोग' का मुख्य ध्यान ब्रिटिश संस्थाओं (स्कूल, अदालत, नौकरियां) और सामानों का 'बहिष्कार' करने पर था। जबकि 'सविनय अवज्ञा' (जैसा कि 1930 के नमक सत्याग्रह में देखा गया) का मुख्य ध्यान जानबूझकर और शांतिपूर्वक विशिष्ट 'अन्यायपूर्ण कानूनों को तोड़ने' पर था, जैसे नमक कानून।
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