भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास कई जटिल और महत्वपूर्ण अध्यायों से भरा है। ऐसा ही एक अध्याय है 'खिलाफत आंदोलन' (Khilafat Movement)। 1919 से 1924 तक चला यह आंदोलन, भारतीय राजनीति में एक ऐसा मोड़ था जिसने न केवल ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दी, बल्कि महात्मा गांधी के 'असहयोग आंदोलन' (Non-Cooperation Movement) के साथ मिलकर हिंदू-मुस्लिम एकता की एक अभूतपूर्व मिसाल भी पेश की।
लेकिन यह आंदोलन था क्या? यह भारत से हजारों मील दूर तुर्की के 'खलीफा' के लिए क्यों लड़ा गया? और कैसे इसने भारत की आजादी की लड़ाई को हमेशा के लिए बदल दिया? आइए, इस ऐतिहासिक घटना को गहराई से समझते हैं।
विषय सूची (Table of Contents)
- खिलाफत आंदोलन की पृष्ठभूमि: मुद्दा भारत का, चिंगारी तुर्की से
- खिलाफत आंदोलन क्यों शुरू हुआ? (मुख्य कारण)
- भारत में आंदोलन की शुरुआत और प्रमुख नेता
- महात्मा गांधी और खिलाफत आंदोलन: एक रणनीतिक गठजोड़
- असहयोग आंदोलन के साथ विलय: एक राष्ट्रव्यापी जन-आंदोलन
- आंदोलन का प्रभाव और हिंदू-मुस्लिम एकता का शिखर
- आंदोलन की समाप्ति और विफलता के कारण
- हिंदू-मुस्लिम एकता पर दीर्घकालिक असर: एक विश्लेषण
- निष्कर्ष: खिलाफत आंदोलन का ऐतिहासिक सबक
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
खिलाफत आंदोलन की पृष्ठभूमि: मुद्दा भारत का, चिंगारी तुर्की से
खिलाफत आंदोलन को समझने के लिए हमें प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के समय में वापस जाना होगा। इस युद्ध में ब्रिटेन ने तुर्की (ऑटोमन साम्राज्य) के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। तुर्की की हार हुई और ब्रिटिश सरकार ने ऑटोमन साम्राज्य को विघटित करने का फैसला किया।
यह बात भारतीय मुसलमानों के लिए गहरी चिंता का विषय थी। इसका कारण भारत की राजनीति नहीं, बल्कि धार्मिक भावनाएँ थीं।
खिलाफत आंदोलन क्यों शुरू हुआ? (मुख्य कारण)
प्रथम विश्व युद्ध और तुर्की का पतन
युद्ध में तुर्की की हार के बाद, विजेता ब्रिटिश और फ्रांसीसी शक्तियों ने उसके साम्राज्य को आपस में बांटने का फैसला किया। भारतीय मुसलमानों को डर था कि ब्रिटिश सरकार तुर्की के साथ बहुत कठोर व्यवहार करेगी, जिससे उनकी धार्मिक संप्रभुता को खतरा होगा।
'खलीफा' का मुद्दा क्या था?
तुर्की का सुल्तान, जिसे 'खलीफा' (Caliph) भी कहा जाता था, दुनिया भर के सुन्नी मुसलमानों का आध्यात्मिक और धार्मिक प्रमुख माना जाता था। खलीफा का पद इस्लाम की एकता और संप्रभुता का प्रतीक था। भारतीय मुसलमानों का मानना था कि खलीफा का इस्लाम के पवित्र स्थानों पर नियंत्रण बना रहना चाहिए।
अपमानजनक 'सेवर्स की संधि' (Treaty of Sèvres)
1920 में हुई 'सेवर्स की संधि' ने इन आशंकाओं को सच साबित कर दिया। इस संधि के तहत तुर्की पर बेहद कठोर शर्तें लगाई गईं:
- ऑटोमन साम्राज्य को लगभग समाप्त कर दिया गया।
- तुर्की को अपने कई महत्वपूर्ण प्रदेश (जैसे फिलिस्तीन, सीरिया, इराक) छोड़ने पड़े।
- खलीफा के अधिकार बहुत सीमित कर दिए गए।
इस संधि को भारतीय मुसलमानों ने अपने धर्म और अपने आध्यात्मिक नेता का घोर अपमान माना। इसी अपमान के विरोध में भारत में 'खिलाफत आंदोलन' की नींव पड़ी।
भारत में आंदोलन की शुरुआत और प्रमुख नेता
खिलाफत कमेटी का गठन
मार्च 1919 में, बंबई (अब मुंबई) में 'अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी' (All India Khilafat Committee) का गठन किया गया। इस कमेटी का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार पर दबाव डालकर तुर्की के खलीफा के पक्ष में एक सम्मानजनक संधि सुनिश्चित करवाना था।
अली बंधु (शौकत अली और मुहम्मद अली जौहर)
इस आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से 'अली बंधुओं' - शौकत अली और मुहम्मद अली जौहर - ने किया। वे जुझारू नेता और पत्रकार थे जिन्होंने अपने अखबारों (जैसे 'कॉमरेड' और 'हमदर्द') के माध्यम से खिलाफत के मुद्दे को घर-घर तक पहुंचाया। उनके अलावा, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, हकीम अजमल खान और हसरत मोहानी जैसे कई अन्य मुस्लिम नेता भी इस आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल थे।
महात्मा गांधी और खिलाफत आंदोलन: एक रणनीतिक गठजोड़
यह वह मोड़ है जहाँ यह आंदोलन केवल मुस्लिम समुदाय तक सीमित न रहकर एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया। महात्मा गांधी ने इस आंदोलन में एक बड़ा अवसर देखा।
"अगर मुसलमान खलीफा के सम्मान के लिए लड़ रहे हैं, तो यह हिंदुओं का कर्तव्य है कि वे अपने मुसलमान भाइयों का साथ दें।" - महात्मा गांधी
गांधीजी ने समर्थन क्यों दिया?
गांधीजी के समर्थन के पीछे गहरे रणनीतिक कारण थे:
- स्वतंत्रता संग्राम का विस्तार: गांधीजी समझ गए थे कि केवल शहरी मध्यवर्ग के दम पर आजादी नहीं मिल सकती। उन्हें एक ऐसे जन-आंदोलन की जरूरत थी जिसमें देश का आम आदमी, किसान और मजदूर शामिल हों।
- रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग: 1919 में ही रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग नरसंहार जैसी घटनाओं ने पूरे देश में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भयंकर गुस्सा भर दिया था। गांधीजी इस गुस्से को एक संगठित दिशा देना चाहते थे।
- मुसलमानों को जोड़ना: गांधीजी को लगा कि अगर कांग्रेस और हिंदू, मुसलमानों के इस धार्मिक मुद्दे पर उनका साथ देते हैं, तो यह उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा से जोड़ने का एक सुनहरा मौका होगा।
हिंदू-मुस्लिम एकता का ऐतिहासिक अवसर
गांधीजी का मानना था कि हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना स्वराज (स्व-शासन) असंभव है। उन्होंने खिलाफत के मुद्दे को "हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने का ऐसा अवसर जो अगले सौ वर्षों तक नहीं मिलेगा" के रूप में देखा। नवंबर 1919 में, दिल्ली में हुए अखिल भारतीय खिलाफत सम्मेलन की अध्यक्षता भी महात्मा गांधी ने ही की थी।
असहयोग आंदोलन के साथ विलय: एक राष्ट्रव्यापी जन-आंदोलन
1920 तक, गांधीजी ने कांग्रेस को इस बात के लिए मना लिया कि वह खिलाफत के मुद्दे को 'असहयोग' के साथ जोड़ दे। 1 अगस्त 1920 को, गांधीजी ने औपचारिक रूप से 'असहयोग आंदोलन' (Non-Cooperation Movement) की शुरुआत की।
अब यह लड़ाई सिर्फ तीन मुद्दों पर लड़ी जा रही थी:
- खिलाफत का मुद्दा (तुर्की के साथ न्याय)।
- पंजाब का अन्याय (जलियांवाला बाग नरसंहार का बदला)।
- स्वराज की प्राप्ति।
खिलाफत और असहयोग, ये दोनों आंदोलन एक-दूसरे में इस कदर मिल गए कि इन्हें अलग करके देखना मुश्किल हो गया। पूरे देश में एक अभूतपूर्व माहौल बन गया।
आंदोलन का प्रभाव और हिंदू-मुस्लिम एकता का शिखर
इस गठजोड़ का प्रभाव जबरदस्त था। यह ब्रिटिश राज के खिलाफ पहला अखिल भारतीय जन-आंदोलन बन गया।
- बहिष्कार (Boycott): छात्रों ने सरकारी स्कूल और कॉलेज छोड़ दिए। वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार किया। लोगों ने विदेशी कपड़ों की होली जलाई और स्वदेशी अपनाना शुरू कर दिया।
- एकता के प्रतीक: हिंदू और मुसलमान एक साथ जुलूस निकालने लगे। कई मस्जिदों से हिंदू नेताओं ने और मंदिरों से मुस्लिम नेताओं ने भाषण दिए। स्वामी श्रद्धानंद जैसे आर्य समाजी नेता को दिल्ली की जामा मस्जिद के मिंबर से भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया, जो एकता का एक अविश्वसनीय प्रतीक था।
- ब्रिटिश सरकार पर दबाव: आंदोलन की व्यापकता ने ब्रिटिश सरकार को हिलाकर रख दिया। वायसराय ने इसे "1857 के बाद का सबसे गंभीर खतरा" बताया।
आंदोलन की समाप्ति और विफलता के कारण
1919 में शुरू हुआ यह शक्तिशाली आंदोलन 1922 आते-आते बिखरने लगा। इसकी विफलता के कारण आंतरिक और बाहरी दोनों थे।
चौरी-चौरा कांड (1922)
फरवरी 1922 में, उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नामक स्थान पर, आंदोलनकारियों की गुस्साई भीड़ ने एक पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए। महात्मा गांधी 'अहिंसा' के अपने सिद्धांत के प्रति दृढ़ थे। इस हिंसक घटना से वे इतने आहत हुए कि उन्होंने 12 फरवरी 1922 को 'असहयोग आंदोलन' को तत्काल वापस लेने की घोषणा कर दी।
गांधीजी के इस फैसले से खिलाफत के नेताओं सहित कई राष्ट्रवादियों को गहरा धक्का लगा। उन्हें लगा कि जब आंदोलन अपने चरम पर था, तब उसे वापस लेना एक बड़ी गलती थी।
तुर्की में क्रांति: मुस्तफा कमाल पाशा का उदय
जिस मुद्दे को लेकर यह सारा आंदोलन खड़ा हुआ था, वह मुद्दा ही तुर्की में समाप्त हो गया। तुर्की में 'मुस्तफा कमाल पाशा' (Mustafa Kemal Atatürk) के नेतृत्व में एक राष्ट्रवादी क्रांति हुई। उन्होंने सुल्तान के शासन को उखाड़ फेंका और तुर्की को एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बनाने का फैसला किया।
खिलाफत का अंत (1924)
मार्च 1924 में, मुस्तफा कमाल पाशा की नई सरकार ने 'खलीफा' के पद को ही हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। जिस 'खिलाफत' को बचाने के लिए भारतीय मुसलमान लड़ रहे थे, उसे खुद तुर्की के लोगों ने ही खत्म कर दिया।
इस घटना के साथ, भारत में खिलाफत आंदोलन पूरी तरह से अप्रासंगिक और उद्देश्यहीन हो गया और 1924 तक यह पूरी तरह समाप्त हो गया।
हिंदू-मुस्लिम एकता पर दीर्घकालिक असर: एक विश्लेषण
यह खिलाफत आंदोलन का सबसे विवादास्पद पहलू है।
सकारात्मक प्रभाव: अल्पकालिक रूप से, इसने हिंदू-मुस्लिम एकता का वह शिखर दिखाया जो पहले कभी नहीं देखा गया था। इसने यह साबित कर दिया कि दोनों समुदाय मिलकर ब्रिटिश राज को चुनौती दे सकते हैं। इसने मुसलमानों को बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल किया।
नकारात्मक प्रभाव: कई विश्लेषकों का मानना है कि इस आंदोलन का दीर्घकालिक प्रभाव नकारात्मक रहा।
- धार्मिक मुद्दों का राजनीतिकरण: आलोचकों का कहना है कि गांधीजी ने एक विशुद्ध धार्मिक मुद्दे (खिलाफत) को राष्ट्रीय राजनीति में लाकर गलती की। इससे राजनीति में धर्म का प्रवेश हुआ, जिसने भविष्य में सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया।
- अस्थायी एकता: यह एकता एक बाहरी और धार्मिक मुद्दे पर आधारित थी, न कि एक साझा धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय पहचान पर। जैसे ही वह धार्मिक मुद्दा (खलीफा) समाप्त हुआ, एकता भी बिखर गई।
- मोपला विद्रोह (1921): इसी दौरान केरल के मालाबार क्षेत्र में 'मोपला विद्रोह' हुआ। यह मूल रूप से जमींदारों के खिलाफ एक किसान विद्रोह था, लेकिन जल्द ही इसने हिंसक सांप्रदायिक रूप ले लिया, जिसमें कई हिंदुओं को निशाना बनाया गया। इस घटना ने हिंदू-मुस्लिम संबंधों में गहरी दरार डाल दी।
आंदोलन के बिखरने के बाद, दोनों समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ने लगा। 1920 के दशक के मध्य तक देश में कई सांप्रदायिक दंगे हुए। बाद के वर्षों में, इसी अविश्वास ने राजनीतिक रूप लिया, जिसकी परिणति हमें 1928 की नेहरू रिपोर्ट और जिन्ना के चौदह सूत्रीय मांगों के टकराव में दिखाई देती है।
निष्कर्ष: खिलाफत आंदोलन का ऐतिहासिक सबक
खिलाफत आंदोलन (1919-1924) भारतीय इतिहास का एक जटिल और महत्वपूर्ण अध्याय है। यह एक ऐसा आंदोलन था जो शुरू तो एक विदेशी धार्मिक मुद्दे पर हुआ, लेकिन महात्मा गांधी के नेतृत्व में यह भारत के सबसे बड़े जन-आंदोलन 'असहयोग' का हिस्सा बन गया।
इसने ब्रिटिश हुकूमत को अभूतपूर्व चुनौती दी और हिंदू-मुस्लिम एकता का एक स्वर्णिम, यद्यपि क्षणिक, दौर दिखाया। हालांकि, इसकी विफलता और तुर्की में खलीफा पद की समाप्ति ने इस एकता को तोड़ दिया और भारतीय राजनीति पर गहरे निशान छोड़े।
खिलाफत आंदोलन हमें सिखाता है कि जन-आंदोलन की शक्ति अपार है, लेकिन साथ ही यह भी याद दिलाता है कि धार्मिक प्रतीकों पर आधारित एकता कितनी नाजुक हो सकती है। यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा सबक है जिसे आज भी याद रखना प्रासंगिक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: खिलाफत आंदोलन क्यों हुआ?
उत्तर: खिलाफत आंदोलन मुख्य रूप से प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा तुर्की के खलीफा (ऑटोमन सुल्तान) के साथ किए गए कठोर व्यवहार के विरोध में शुरू हुआ था। भारतीय मुसलमान खलीफा को अपना आध्यात्मिक नेता मानते थे और सेवर्स की संधि द्वारा उनके अधिकारों को छीन लिए जाने से नाराज थे।
प्रश्न 2: खिलाफत आंदोलन के मुख्य नेता कौन थे?
उत्तर: इसके प्रमुख नेताओं में 'अली बंधु' (शौकत अली और मुहम्मद अली जौहर), मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, हकीम अजमल खान और हसरत मोहानी शामिल थे। बाद में महात्मा गांधी इसके सबसे बड़े राष्ट्रीय चेहरा बने।
प्रश्न 3: गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन क्यों किया?
उत्तर: गांधीजी ने इसे ब्रिटिश राज के खिलाफ एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा करने और हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने के एक "स्वर्णिम अवसर" के रूप में देखा। वे मुसलमानों को राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा में लाना चाहते थे।
प्रश्न 4: खिलाफत आंदोलन का अंत कैसे हुआ?
उत्तर: इसके दो मुख्य कारण थे। पहला, फरवरी 1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लेना। दूसरा और सबसे बड़ा कारण, 1924 में तुर्की में ही मुस्तफा कमाल पाशा की नई सरकार द्वारा 'खलीफा' के पद को समाप्त कर देना, जिसने इस आंदोलन को ही अप्रासंगिक बना दिया।
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