भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अनगिनत कुर्बानियों, आंदोलनों और महत्वपूर्ण घटनाओं से भरा पड़ा है। लेकिन साल 1919 एक ऐसा मोड़ लेकर आया, जिसने ब्रिटिश हुकूमत के क्रूर चेहरे को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। यह वह वर्ष था जब ब्रिटिश सरकार ने रोलेट एक्ट (Rowlatt Act) जैसा दमनकारी कानून लागू किया और उसी के विरोध में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड (Jallianwala Bagh Massacre) ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। यह नरसंहार भारतीय जनमानस में ब्रिटिश राज के प्रति नफरत का एक ऐसा बीज बो गया, जिसने भविष्य के स्वतंत्रता आंदोलनों की नींव को और मजबूत कर दिया।
इस लेख में, हम 1919 की इन दो जुड़ी हुई घटनाओं - रोलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड - के कारणों, प्रावधानों, घटनाओं और उनके दूरगामी परिणामों का गहन विश्लेषण करेंगे।
रोलेट एक्ट 1919 क्या था? (What was Rowlatt Act?)
रोलेट एक्ट, जिसका आधिकारिक नाम 'अराजक और क्रांतिकारी अपराध अधिनियम, 1919' (Anarchical and Revolutionary Crimes Act of 1919) था, ब्रिटिश भारत की इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल द्वारा दिल्ली में मार्च 1919 में पारित किया गया एक कानून था। इस कानून को 'सिडिशन कमेटी' के अध्यक्ष सर सिडनी रोलेट की सिफारिशों के आधार पर बनाया गया था।
इस कानून का मुख्य उद्देश्य भारत में उभर रहे राष्ट्रीय आंदोलन और क्रांतिकारी गतिविधियों को कुचलना था। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लागू किए गए 'भारत रक्षा अधिनियम 1915' (Defence of India Act 1915) की अवधि समाप्त हो रही थी, और ब्रिटिश सरकार किसी भी कीमत पर अपनी दमनकारी शक्तियों को कम नहीं करना चाहती थी। रोलेट एक्ट ने सरकार को राजनीतिक असंतोष को दबाने के लिए असाधारण शक्तियां प्रदान कीं।
रोलेट एक्ट की पृष्ठभूमि: इसे क्यों लाया गया?
प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के दौरान, भारतीयों ने इस उम्मीद में ब्रिटिश साम्राज्य का भरपूर समर्थन किया था कि युद्ध की समाप्ति के बाद उन्हें स्व-शासन (Self-Rule) या कम से कम महत्वपूर्ण राजनीतिक सुधार मिलेंगे। महात्मा गांधी ने भी लोगों को सेना में भर्ती होने के लिए प्रोत्साहित किया था।
लेकिन युद्ध समाप्त होते ही, ब्रिटिश सरकार अपने वादों से मुकर गई। इसके विपरीत, वे भारत में बढ़ रहे राष्ट्रवाद (विशेषकर बंगाल, पंजाब और महाराष्ट्र में क्रांतिकारी गतिविधियों) से चिंतित थे। उन्हें डर था कि यदि 'भारत रक्षा अधिनियम' जैसे कठोर कानून हटा लिए गए, तो एक बड़ा विद्रोह हो सकता है। इसी डर के चलते, 1917 में, सर सिडनी रोलेट की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया, जिसे यह जांचना था कि भारत में 'राजद्रोही' गतिविधियों से कैसे निपटा जाए। इसी समिति की सिफारिशों ने रोलेट एक्ट का आधार तैयार किया।
रोलेट एक्ट के दमनकारी प्रावधान ('काला कानून')
रोलेट एक्ट के प्रावधान इतने कठोर और अलोकतांत्रिक थे कि इसे भारतीयों द्वारा सर्वसम्मति से 'काला कानून' (Black Act) कहा गया। इसके सबसे कुख्यात प्रावधान निम्नलिखित थे:
- गिरफ्तारी का अधिकार: पुलिस को यह अधिकार दिया गया कि वह किसी भी भारतीय पर संदेह होने मात्र से उसे बिना किसी वारंट के गिरफ्तार कर सकती थी।
- बिना मुकदमा नजरबंदी: सरकार को किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए, अनिश्चित काल (शुरुआत में 2 साल तक) के लिए जेल में रखने का अधिकार मिल गया।
- विशेष अदालतें: राजद्रोही मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें स्थापित की गईं, जिनके फैसलों के खिलाफ कोई अपील नहीं की जा सकती थी।
- प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश: सरकार को राजद्रोही समझे जाने वाले किसी भी साहित्य को जब्त करने और छापने पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार था।
- 'न वकील, न दलील, न अपील': इस कानून को संक्षेप में "न वकील, न दलील, न अपील" का कानून कहा गया, क्योंकि इसने अभियुक्तों से उनके बुनियादी कानूनी अधिकार छीन लिए थे।
रोलेट एक्ट का राष्ट्रव्यापी विरोध और 'रोलेट सत्याग्रह'
इस 'काले कानून' के खिलाफ पूरे भारत में जबरदस्त गुस्सा फूट पड़ा। महात्मा गांधी, जो अब तक ब्रिटिश न्याय प्रणाली में कुछ हद तक विश्वास रखते थे, इस कानून से स्तब्ध थे। उन्होंने इसके खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी 'सत्याग्रह' का आह्वान किया। 6 अप्रैल 1919 को देशव्यापी हड़ताल और विरोध दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया।
यह गांधीजी द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित पहला बड़ा आंदोलन था। देश भर में दुकानें बंद हो गईं, जुलूस निकाले गए और सभाएं हुईं। हिंदुओं और मुसलमानों ने इस विरोध में एकजुट होकर भाग लिया, जिससे अभूतपूर्व सांप्रदायिक एकता देखने को मिली। हालांकि, यह विरोध मुख्य रूप से शहरों तक ही सीमित था और कई स्थानों पर, विशेषकर पंजाब में, यह शांतिपूर्ण नहीं रह पाया।
जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919)
रोलेट एक्ट के विरोध की आग पंजाब, विशेषकर अमृतसर में, सबसे अधिक भड़की हुई थी। ब्रिटिश सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए दमन का सहारा लिया और पंजाब के कई हिस्सों में मार्शल लॉ (सैनिक शासन) लागू कर दिया गया।
अमृतसर की घटनाएँ: डॉ. किचलू और डॉ. सत्यपाल की गिरफ्तारी
अमृतसर में विरोध का नेतृत्व दो लोकप्रिय राष्ट्रवादी नेताओं - डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल - कर रहे थे। वे हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक बन गए थे। 10 अप्रैल 1919 को, पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ'डायर (Michael O'Dwyer) के आदेश पर, इन दोनों नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें किसी अज्ञात स्थान पर भेज दिया गया।
इस गिरफ्तारी की खबर फैलते ही अमृतसर में लोग भड़क उठे। एक शांतिपूर्ण जुलूस अपने नेताओं की रिहाई की मांग के लिए डिप्टी कमिश्नर के आवास की ओर बढ़ा। पुलिस ने जुलूस पर गोलियां चला दीं, जिससे कई प्रदर्शनकारी मारे गए। इस हिंसा ने भीड़ को और अधिक उत्तेजित कर दिया, और जवाबी हिंसा में कुछ ब्रिटिश नागरिकों की हत्या कर दी गई और सरकारी इमारतों को आग लगा दी गई। स्थिति को नियंत्रण से बाहर होता देख, 11 अप्रैल को शहर का प्रशासन ब्रिगेडियर-जनरल रेजिनाल्ड डायर (Reginald Dyer) को सौंप दिया गया।
13 अप्रैल 1919: बैसाखी का वो खूनी दिन
13 अप्रैल 1919, बैसाखी का दिन था। यह पंजाब का एक प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक त्योहार है। आस-पास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग बैसाखी मनाने और स्वर्ण मंदिर में दर्शन करने के लिए अमृतसर आए थे। इनमें से कई लोगों को शहर में लागू मार्शल लॉ या जनरल डायर द्वारा लगाए गए सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध की कोई जानकारी नहीं थी।
उसी दिन शाम को, रोलेट एक्ट और अपने नेताओं की गिरफ्तारी का शांतिपूर्ण विरोध करने के लिए लगभग 15,000 से 20,000 लोगों की भीड़ अमृतसर के जलियांवाला बाग में इकट्ठा हुई। यह बाग चारों तरफ से ऊंची दीवारों से घिरा हुआ था और बाहर निकलने के लिए केवल एक-दो संकरे रास्ते ही थे।
जैसे ही सभा शुरू हुई, जनरल डायर अपने सैनिकों (जिनमें गोरखा और बलूच रेजिमेंट के सैनिक शामिल थे) के साथ वहां पहुंचा। उसने बाग के एकमात्र मुख्य निकास को अवरुद्ध कर दिया और बिना किसी चेतावनी के, निहत्थे और शांतिपूर्ण भीड़ पर गोलियां चलाने का आदेश दे दिया।
सैनिकों ने लगभग 10 से 15 मिनट तक लगातार गोलियां बरसाईं। गोलियां तभी रुकीं जब सैनिकों के पास गोला-बारूद खत्म हो गया। भगदड़ मच गई, लोग अपनी जान बचाने के लिए दीवारों पर चढ़ने की कोशिश करने लगे या बाग के बीच में स्थित एकमात्र कुएं में कूद गए। यह एक पूर्व नियोजित नरसंहार था।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस हत्याकांड में 379 लोग मारे गए और 1,200 से अधिक घायल हुए। हालांकि, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अन्य गैर-सरकारी स्रोतों के अनुसार, मरने वालों की संख्या 1,000 से अधिक थी। वह कुआं लाशों से भर गया था।
कौन था जनरल डायर? (Who was General Dyer?)
ब्रिगेडियर-जनरल रेजिनाल्ड डायर (Reginald Dyer) वह ब्रिटिश सैन्य अधिकारी था जिसने जलियांवाला बाग में गोली चलाने का आदेश दिया था। बाद में उसने बेशर्मी से स्वीकार किया कि उसका उद्देश्य केवल भीड़ को तितर-बितर करना नहीं, बल्कि "एक नैतिक सबक सिखाना" और भारतीयों के मन में "आतंक" पैदा करना था, ताकि वे भविष्य में विद्रोह करने का साहस न कर सकें। इस क्रूरता के लिए उसे 'अमृतसर का कसाई' (Butcher of Amritsar) भी कहा जाता है।
हत्याकांड के परिणाम और प्रतिक्रियाएँ
जलियांवाला बाग नरसंहार की खबर को शुरू में सेंसरशिप के जरिए दबाने की कोशिश की गई, लेकिन जब यह फैली, तो पूरे देश और यहां तक कि ब्रिटेन में भी इसकी कड़ी निंदा हुई।
हंटर आयोग (Hunter Commission) का गठन
बढ़ते जन आक्रोश के दबाव में, ब्रिटिश सरकार ने अक्टूबर 1919 में इस घटना की जांच के लिए लॉर्ड विलियम हंटर की अध्यक्षता में 'हंटर आयोग' (Hunter Commission) का गठन किया। जनरल डायर ने आयोग के सामने गवाही देते हुए स्वीकार किया कि उसने बिना चेतावनी के गोली चलवाई थी और अगर उसके पास और गोला-बारूद होता तो वह और भी गोली चलवाता।
आयोग ने 1920 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें डायर के कार्यों की निंदा की गई, लेकिन उसे केवल 'कर्तव्य की गलत समझ' का दोषी ठहराया गया। उसे उसके पद से हटा दिया गया और अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई। विडंबना यह है कि ब्रिटेन में कई रूढ़िवादी लोगों ने उसे 'साम्राज्य का रक्षक' माना और उसके लिए चंदा इकट्ठा किया।
रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा 'नाइटहुड' की उपाधि का त्याग
इस बर्बर हत्याकांड के विरोध में, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश क्राउन द्वारा उन्हें दी गई 'नाइटहुड' (Knighthood) की उपाधि त्याग दी। उन्होंने वायसराय को लिखे एक पत्र में कहा, "यह सम्मान अब अपमान के इस अनुचित संदर्भ में शर्म का प्रतीक बन गया है।"
स्वतंत्रता संग्राम पर जलियांवाला बाग का प्रभाव
1919 की इन घटनाओं का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर गहरा और स्थायी प्रभाव पड़ा:
- ब्रिटिश न्याय से मोहभंग: महात्मा गांधी सहित उन उदारवादी नेताओं का भी ब्रिटिश न्याय और निष्पक्षता से विश्वास उठ गया, जो अब तक सुधारों की उम्मीद कर रहे थे।
- असहयोग आंदोलन की नींव: इस घटना ने गांधीजी को 1920 में 'असहयोग आंदोलन' (Non-Cooperation Movement) शुरू करने के लिए प्रेरित किया। यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ पहला जन-आंदोलन था।
- क्रांतिकारियों का उदय: इस क्रूरता ने भगत सिंह और उधम सिंह जैसे कई युवाओं को क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित किया। (उधम सिंह ने 1940 में लंदन जाकर माइकल ओ'डायर की हत्या करके जलियांवाला बाग का बदला लिया था)।
- पूर्ण स्वतंत्रता की मांग: इस घटना के बाद, 'स्व-शासन' की मांग धीरे-धीरे 'पूर्ण स्वतंत्रता' (पूर्ण स्वराज) की मांग में बदल गई, जिसने भविष्य के आंदोलनों जैसे क्रिप्स मिशन (1942) और अगस्त प्रस्ताव को भी प्रभावित किया। यह भारत के अपने संविधान निर्माण की प्रक्रिया की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
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निष्कर्ष
1919 का रोलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के इतिहास के सबसे काले पन्नों में से एक हैं। 'काला कानून' ब्रिटिश सरकार की दमनकारी मानसिकता का प्रतीक था, और जलियांवाला बाग उस मानसिकता की क्रूरतम अभिव्यक्ति थी। इस नरसंहार ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदल दी, इसे एक जन आंदोलन में तब्दील कर दिया और यह स्पष्ट कर दिया कि स्वतंत्रता केवल बलिदान और निरंतर संघर्ष से ही प्राप्त की जा सकती है। आज भी, जलियांवाला बाग उन निर्दोष शहीदों की याद दिलाता है जिन्होंने भारत की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न: रोलेट एक्ट क्या था? (What was Rowlatt Act?)
उत्तर: रोलेट एक्ट 1919 में ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में लागू किया गया एक दमनकारी कानून था। इसका आधिकारिक नाम 'अराजक और क्रांतिकारी अपराध अधिनियम, 1919' था। यह सरकार को किसी भी भारतीय को बिना वारंट के गिरफ्तार करने और बिना मुकदमा चलाए 2 साल तक जेल में रखने का अधिकार देता था।
प्रश्न: रोलेट एक्ट को 'काला कानून' क्यों कहा गया?
उत्तर: इसे 'काला कानून' कहा गया क्योंकि यह भारतीयों के मौलिक अधिकारों (जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानूनी बचाव का अधिकार) का हनन करता था। इसे "न वकील, न दलील, न अपील" का कानून माना गया।
प्रश्न: जलियांवाला बाग हत्याकांड कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर: जलियांवाला बाग हत्याकांड 13 अप्रैल 1919 को (बैसाखी के दिन) अमृतसर, पंजाब के जलियांवाला बाग नामक स्थान पर हुआ था।
प्रश्न: जलियांवाला बाग में गोली चलाने का आदेश किसने दिया था?
उत्तर: जलियांवाला बाग में निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने का आदेश ब्रिटिश सेना के अधिकारी ब्रिगेडियर-जनरल रेजिनाल्ड डायर (General Dyer) ने दिया था।
प्रश्न: जलियांवाला बाग हत्याकांड का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर: इसका मुख्य और तात्कालिक कारण रोलेट एक्ट का विरोध और 10 अप्रैल को अमृतसर के दो लोकप्रिय नेताओं, डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल की गिरफ्तारी थी। लोग 13 अप्रैल को इन्हीं गिरफ्तारियों और रोलेट एक्ट के खिलाफ एक शांतिपूर्ण सभा के लिए जलियांवाला बाग में एकत्र हुए थे।
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