'गांधी युग' की हमारी सीरीज़ में, 1917 के चंपारण सत्याग्रह की अपार सफलता के बाद, महात्मा गांधी ने यह सिद्ध कर दिया था कि 'सत्याग्रह' भारत की धरती पर एक अचूक अस्त्र है। (जैसा कि हमने पिछली पोस्ट में पढ़ा)। चंपारण ने गांधीजी को 'महात्मा' के रूप में स्थापित किया, लेकिन 1918 में गुजरात के खेड़ा जिले ने उन्हें एक ऐसा 'सरदार' दिया, जिसने भारत के भूगोल को एक करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई।
खेड़ा सत्याग्रह 1918 (Kheda Satyagraha 1918), चंपारण के ठीक बाद हुआ, गांधीजी का दूसरा बड़ा किसान आंदोलन था। यह भारत का पहला वास्तविक 'कर नहीं' (No-Tax) आंदोलन था। यह आंदोलन सिर्फ फसल और कर माफी का नहीं था; यह किसानों के आत्म-सम्मान, ब्रिटिश कानून के खोखलेपन और एक नए नेतृत्व के उदय की कहानी थी। यह वह भट्टी थी जिसमें तपकर 'बैरिस्टर वल्लभभाई पटेल' देश के 'सरदार पटेल' बनने की राह पर निकले।
आखिर 1918 में खेड़ा के किसान क्यों विद्रोह कर रहे थे? वह कौन सा कानून था जिसके लिए वे लड़ रहे थे? और कैसे गांधी और पटेल की जोड़ी ने इस आंदोलन को एक ऐतिहासिक सफलता दिलाई? आइए, इस महत्वपूर्ण घटना का गहराई से विश्लेषण करते हैं।
विषय सूची (Table of Contents)
- खेड़ा सत्याग्रह 1918 के मुख्य कारण क्या थे?
- 'चार आना' फसल का नियम और ब्रिटिश हठधर्मिता
- स्थानीय नेतृत्व का उदय और गांधीजी का आगमन
- सरदार पटेल का उदय: आंदोलन के 'सेनापति'
- सत्याग्रह की प्रतिज्ञा और 'कर नहीं' अभियान
- सरकार का दमन: कुर्की, जब्ती और 'डूंगळी चोर'
- आंदोलन का परिणाम और ऐतिहासिक सफलता
- खेड़ा सत्याग्रह का महत्व और विरासत
- निष्कर्ष: आत्म-सम्मान की लड़ाई
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
खेड़ा सत्याग्रह 1918 के मुख्य कारण क्या थे?
खेड़ा सत्याग्रह की जड़ में प्राकृतिक आपदा और अंग्रेजी हुकूमत की संवेदनहीनता थी। 1917-18 में गुजरात का खेड़ा जिला (जो उस समय बॉम्बे प्रेसीडेंसी का हिस्सा था) भयंकर सूखे और अकाल की चपेट में आ गया।
इसके मुख्य कारण थे:
- अत्यधिक वर्षा और बाढ़: पहले 1917 में मानसून की अत्यधिक वर्षा ने खरीफ की फसल को बर्बाद कर दिया।
- सूखा और प्लेग: इसके तुरंत बाद, सूखे की स्थिति पैदा हो गई, जिससे रबी की फसल भी नष्ट हो गई।
- महामारी का प्रकोप: फसलें बर्बाद होने के साथ-साथ, जिले में प्लेग और इन्फ्लूएंजा जैसी महामारियाँ भी फैल गईं, जिससे हजारों लोग और मवेशी मारे गए।
किसानों की आर्थिक कमर पूरी तरह टूट चुकी थी। उनके पास खाने के लिए अनाज नहीं था, मवेशी मर रहे थे। ऐसी विनाशकारी स्थिति के बावजूद, ब्रिटिश सरकार ने किसानों से पूरे 'भू-राजस्व' (Land Revenue or Tax) की मांग की। किसानों ने गुहार लगाई कि इस साल कर माफ कर दिया जाए, लेकिन स्थानीय अंग्रेज अधिकारियों ने उनकी एक न सुनी।
'चार आना' फसल का नियम और ब्रिटिश हठधर्मिता
यह जानना बहुत दिलचस्प है कि खेड़ा के किसान कोई गैर-कानूनी मांग नहीं कर रहे थे। वे बस उसी कानून को लागू करने की मांग कर रहे थे जो खुद ब्रिटिश सरकार ने बनाया था।
बॉम्बे प्रेसीडेंसी के 'राजस्व संहिता' (Revenue Code) में यह स्पष्ट लिखा था:
"यदि किसी वर्ष फसल का उत्पादन, सामान्य उत्पादन के 25% (यानी 'चार आना') से कम होता है, तो किसानों को उस वर्ष के भू-राजस्व से पूर्ण छूट (full remission) दी जाएगी।"
किसानों का दावा था कि उनकी फसल 'चार आना' से भी कम हुई है, इसलिए वे कानूनी तौर पर कर माफी के हकदार थे। लेकिन सरकार हठ पर अड़ी थी। स्थानीय अंग्रेज अधिकारियों (कलेक्टर) ने एक फर्जी सर्वे करवाया और घोषणा कर दी कि फसल का उत्पादन 25% से *अधिक* हुआ है, इसलिए सभी को पूरा कर देना होगा।
यह किसानों के लिए सिर्फ पैसे का मामला नहीं था, यह उनके आत्म-सम्मान और सच्चाई की लड़ाई बन गया था।
स्थानीय नेतृत्व का उदय और गांधीजी का आगमन
गांधीजी के राष्ट्रीय पटल पर आने से पहले ही खेड़ा में स्थानीय नेता इस अन्याय के खिलाफ सक्रिय हो चुके थे।
- गुजरात सभा का प्रयास: 'गुजरात सभा' नामक संस्था ने, जिसके अध्यक्ष उस समय गांधीजी ही थे, इस मामले को उठाया। उन्होंने याचिकाओं और ज्ञापनों के जरिए सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की।
- वल्लभभाई पटेल और इंदुलाल याज्ञिक: अहमदाबाद के दो युवा बैरिस्टर, वल्लभभाई पटेल और इंदुलाल याज्ञिक ने इस मामले में गहरी दिलचस्पी ली। उन्होंने खेड़ा के गाँवों का दौरा किया, किसानों की स्थिति देखी और पाया कि उनकी मांगें पूरी तरह जायज थीं।
जब याचिकाओं और प्रार्थना-पत्रों का कोई असर नहीं हुआ, तो इन स्थानीय नेताओं ने महात्मा गांधी को खेड़ा आने और आंदोलन का नेतृत्व संभालने के लिए आमंत्रित किया। गांधीजी उस समय चंपारण में व्यस्त थे, लेकिन उन्होंने खेड़ा की स्थिति का जायजा लेने के लिए अपने लोगों को भेजा। जब वे खुद खेड़ा पहुँचे, तो उन्होंने भी अपनी जांच में पाया कि किसानों के दावे 100% सही थे।
गांधीजी ने पहले गवर्नर-जनरल (वायसराय) को पत्र लिखकर नरमी बरतने की अपील की, लेकिन जब सरकार ने कर वसूली के लिए दमन का रास्ता अपनाया, तो गांधीजी ने 22 मार्च 1918 को 'सत्याग्रह' की घोषणा कर दी।
सरदार पटेल का उदय: आंदोलन के 'सेनापति'
अगर चंपारण ने देश को 'महात्मा' दिया, तो खेड़ा ने देश को 'सरदार' दिया।
1918 तक वल्लभभाई पटेल अहमदाबाद के एक सफल और पश्चिमी शैली में रहने वाले बैरिस्टर थे। उनकी राजनीति में कोई खास रुचि नहीं थी। लेकिन गांधीजी से मिलने के बाद उनका जीवन बदल गया।
जब गांधीजी ने खेड़ा आंदोलन का नेतृत्व संभाला, तो उन्हें एक ऐसे निष्ठावान 'लेफ्टिनेंट' की जरूरत थी जो पूरी तरह से आंदोलन को समर्पित हो सके। वल्लभभाई पटेल ने अपनी फलती-फूलती वकालत छोड़ दी, अपना पश्चिमी पहनावा त्याग दिया और पूरी तरह से इस किसान आंदोलन में कूद पड़े।
गांधीजी ने आंदोलन की रणनीति बनाई, लेकिन उसे जमीन पर लागू करने का काम 'सेनापति' पटेल ने किया।
- उन्होंने इंदुलाल याज्ञिक, शंकरलाल बैंकर और महादेव देसाई के साथ मिलकर खेड़ा के सैकड़ों गाँवों का दौरा किया।
- उन्होंने किसानों को सत्याग्रह का मतलब समझाया—बिना हिंसा किए, दृढ़ रहना।
- उन्होंने किसानों को एकजुट किया और उनका मनोबल बढ़ाया कि वे अपनी जमीन और मवेशियों की कुर्की से न डरें।
- उनकी संगठनात्मक क्षमता अद्भुत थी। उन्होंने पूरे आंदोलन को अनुशासित और अहिंसक बनाए रखा।
गांधीजी ने खुद पटेल की भूमिका की सराहना करते हुए कहा था कि पटेल के बिना यह आंदोलन संभव नहीं होता। खेड़ा ने वल्लभभाई पटेल को भारतीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया।
सत्याग्रह की प्रतिज्ञा और 'कर नहीं' अभियान
गांधीजी के नेतृत्व में, खेड़ा के किसानों ने नडियाद (Nadiad) में एक सभा में ऐतिहासिक प्रतिज्ञा ली:
"हम, खेड़ा के किसान, प्रतिज्ञा करते हैं कि हम इस वर्ष का भू-राजस्व नहीं देंगे। हम सरकार द्वारा हमारी भूमि, मवेशी या संपत्ति की कुर्की (जब्ती) को सहन करेंगे, लेकिन हम स्वेच्छा से कर देकर अपने आत्म-सम्मान से समझौता नहीं करेंगे।"
यह 'कर नहीं' अभियान (No-Tax Campaign) का स्पष्ट आह्वान था। गांधीजी ने किसानों को सलाह दी कि:
- जो किसान कर देने में *सक्षम* हैं, वे भी कर न दें, ताकि गरीब किसानों का साथ दिया जा सके।
- हिंसा का कोई भी रूप स्वीकार्य नहीं होगा, चाहे सरकारी दमन कितना भी क्रूर क्यों न हो।
- अगर सरकार केवल गरीब किसानों का कर माफ कर दे, तो सक्षम किसान अपना कर चुका देंगे।
सरकार का दमन: कुर्की, जब्ती और 'डूंगळी चोर'
किसानों की प्रतिज्ञा से ब्रिटिश हुकूमत बौखला गई। उन्होंने दमन का चक्र तेज कर दिया।
- कुर्की और नीलामी: सरकारी अधिकारी पुलिस के साथ गाँवों में आते और किसानों के मवेशियों (भैंस, बैल) को जबरन खोलकर ले जाते। घर के सामान, अनाज और यहाँ तक कि बिस्तरों को भी कुर्क कर लिया गया।
- खड़ी फसलों की जब्ती: सरकार ने किसानों की खड़ी फसलों को 'जब्त' घोषित कर दिया।
- डराने-धमकाने की नीति: लोगों को जेल में डालने की धमकियाँ दी गईं और उनकी जमीनों को नीलाम करने के नोटिस चिपका दिए गए।
लेकिन किसान, पटेल और गांधी के नेतृत्व में अद्भुत रूप से शांत और दृढ़ रहे। उन्होंने अपनी संपत्ति लुटते देखी, लेकिन कर नहीं दिया।
इसी दौरान एक प्रसिद्ध घटना घटी। सत्याग्रहियों में से एक, मोहनलाल पंड्या को पता चला कि सरकार ने एक किसान के खेत को जब्त कर लिया है, जिसमें प्याज की फसल खड़ी थी। पंड्या जी अपने साथियों के साथ उस 'जब्त' खेत में गए और प्याज उखाड़ लाए। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और जेल भेज दिया गया। जब यह बात गांधीजी को पता चली, तो वे मुस्कुराए और मोहनलाल पंड्या को 'डूंगळी चोर' (प्याज का चोर) की उपाधि दी, जो उनके लिए एक सम्मान बन गया।
आंदोलन का परिणाम और ऐतिहासिक सफलता
आंदोलन कई महीनों तक चला। किसान टूट रहे थे, लेकिन झुक नहीं रहे थे। सरकार भी समझ गई थी कि वह इन अहिंसक सत्याग्रहियों से जबरदस्ती कर वसूल नहीं कर पाएगी। प्रथम विश्व युद्ध भी चल रहा था और सरकार एक और मोर्चे पर बदनामी नहीं चाहती थी।
अंत में, जून 1918 में, सरकार को झुकना पड़ा।
सरकार ने एक 'गोपनीय' आदेश जारी किया (ताकि उनकी बेइज्जती न हो) कि कर वसूली केवल उन्हीं से की जाए जो देने में सक्षम हैं, और बाकी सभी गरीब किसानों का कर माफ कर दिया जाए।
यह आंदोलन की मुख्य मांग थी। गांधीजी ने इसे सत्याग्रह की जीत माना और आंदोलन वापस ले लिया। सरकार ने यह भी आदेश दिया कि जब्त की गई सभी संपत्ति और जमीनें किसानों को वापस कर दी जाएँ।
यह एक स्पष्ट जीत थी। किसानों ने न केवल कर से मुक्ति पाई, बल्कि उन्होंने अपने आत्म-सम्मान को भी वापस जीता।
खेड़ा सत्याग्रह का महत्व और विरासत
खेड़ा सत्याग्रह का भारतीय इतिहास में बहुत गहरा महत्व है:
- सत्याग्रह की दूसरी जीत: इसने चंपारण के बाद एक बार फिर साबित कर दिया कि 'सत्याग्रह' ब्रिटिश राज के खिलाफ एक शक्तिशाली और व्यावहारिक हथियार है।
- सरदार पटेल का उदय: यह इस आंदोलन की सबसे बड़ी देन थी। वल्लभभाई पटेल एक राष्ट्रीय नायक के रूप में उभरे, जिन्होंने अपना जीवन देश को समर्पित कर दिया। भारत के पहले उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रूप में, उन्होंने ही संविधान निर्माण के बाद बिखरी हुई रियासतों को एक कर 'अखंड भारत' का निर्माण किया।
- किसानों में चेतना: चंपारण के बाद, खेड़ा ने गुजरात और पूरे देश के किसानों को निर्भय बनाया। उन्हें समझ आया कि वे एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए लड़ सकते हैं।
- जनता का कांग्रेस से जुड़ाव: खेड़ा ने कांग्रेस को केवल बुद्धिजीवियों की पार्टी होने की छवि से बाहर निकाला और उसे सीधे किसानों और आम जनता से जोड़ दिया।
निष्कर्ष: आत्म-सम्मान की लड़ाई
1918 का खेड़ा सत्याग्रह सिर्फ कर माफी का आंदोलन नहीं था। यह किसानों के 'हक' और 'आत्म-सम्मान' की लड़ाई थी। यह ब्रिटिश नौकरशाही के घमंड के खिलाफ सच्चाई की लड़ाई थी। इस आंदोलन ने गांधीजी को वह 'सरदार' दिया, जिसकी भारत को सबसे ज्यादा जरूरत थी। चंपारण और खेड़ा की इन दो सफलताओं ने गांधीजी को एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित कर दिया और 1920 के 'असहयोग आंदोलन' जैसे विशाल राष्ट्रव्यापी आंदोलन की नींव तैयार कर दी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: खेड़ा सत्याग्रह क्या था और यह कब हुआ?
उत्तर: खेड़ा सत्याग्रह 1918 में गुजरात के खेड़ा जिले में हुआ एक किसान आंदोलन था। यह ब्रिटिश सरकार द्वारा अकाल और फसल बर्बाद होने के बावजूद जबरन भू-राजस्व (कर) वसूलने के खिलाफ महात्मा गांधी के नेतृत्व में किया गया एक 'कर नहीं' आंदोलन था।
प्रश्न 2: खेड़ा सत्याग्रह के मुख्य नेता कौन थे?
उत्तर: खेड़ा सत्याग्रह का मुख्य नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया था। उनके प्रमुख सहयोगी और आंदोलन के 'सेनापति' वल्लभभाई पटेल (बाद में सरदार पटेल) थे। अन्य प्रमुख नेताओं में इंदुलाल याज्ञिक, शंकरलाल बैंकर और महादेव देसाई शामिल थे।
प्रश्न 3: खेड़ा आंदोलन का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर: मुख्य कारण सूखा, अकाल और महामारी के कारण फसल का 75% से अधिक नष्ट हो जाना था। इसके बावजूद, ब्रिटिश सरकार राजस्व संहिता के नियमों (25% से कम फसल पर कर माफी) का उल्लंघन करते हुए किसानों से जबरन पूरा लगान वसूल रही थी।
प्रश्न 4: खेड़ा सत्याग्रह में सरदार पटेल की क्या भूमिका थी?
उत्तर: यह सरदार पटेल का पहला बड़ा जन आंदोलन था। उन्होंने अपनी सफल वकालत छोड़कर, गाँवों में जाकर किसानों को संगठित किया, उन्हें सत्याग्रह की प्रतिज्ञा दिलाई, और सरकारी दमन के खिलाफ उनका मनोबल बनाए रखा। वे इस आंदोलन के मुख्य रणनीतिकार और संचालक थे।
प्रश्न 5: खेड़ा सत्याग्रह का परिणाम क्या निकला?
उत्तर: यह आंदोलन सफल रहा। सरकार को झुकना पड़ा और एक समझौता हुआ, जिसके तहत गरीब किसानों का उस वर्ष का कर पूरी तरह माफ कर दिया गया, सक्षम किसानों से ही कर लिया गया, और सभी जब्त की गई संपत्ति व जमीनें किसानों को लौटा दी गईं।
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