चार्टर एक्ट 1793 (Charter Act 1793)

चार्टर एक्ट 1793 (Charter Act 1793), जिसे 'ईस्ट इंडिया कंपनी एक्ट 1793' भी कहा जाता है, ब्रिटिश भारत के संवैधानिक इतिहास में एक आधारभूत ढांचा था। अक्सर इतिहास की किताबों में 1813 या 1833 के एक्ट्स की चर्चा ज्यादा होती है, लेकिन 1793 का अधिनियम वह नींव थी जिस पर कंपनी का प्रशासनिक ढांचा अगले 20 वर्षों तक खड़ा रहा। यह वह अधिनियम था जिसने भारत से धन की निकासी (Drain of Wealth) को संस्थागत रूप दिया और गवर्नर-जनरल की शक्तियों को सर्वोच्च बनाया।

चार्टर एक्ट 1793 (Charter Act 1793)

लॉर्ड कॉर्नवालिस, जिनके सुधारों को 1793 के एक्ट ने कानूनी रूप दिया।

आखिर इस एक्ट की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट काफी नहीं था? और सबसे महत्वपूर्ण बात, इस एक्ट ने भारत की अर्थव्यवस्था को कैसे खोखला करना शुरू किया? इस विस्तृत लेख में हम चार्टर एक्ट 1793 के उद्देश्य, प्रावधानों, महत्व और कमियों का गहराई से विश्लेषण करेंगे।

विषय सूची (Table of Contents)

चार्टर एक्ट 1793: एक परिचय

चार्टर एक्ट 1793 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया एक ऐसा कानून था, जिसका मुख्य उद्देश्य ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) के चार्टर को नवीनीकृत (Renew) करना था। पिछला बड़ा अधिनियम 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट था, जिसकी 20 साल की अवधि पूरी हो रही थी।

यह अधिनियम उस समय पारित किया गया जब लॉर्ड कॉर्नवालिस (Lord Cornwallis) का कार्यकाल समाप्त हो रहा था और सर जॉन शोर (Sir John Shore) अगले गवर्नर-जनरल बनने वाले थे। इस एक्ट की सबसे खास बात यह थी कि इसने लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा किए गए प्रशासनिक और न्यायिक सुधारों को कानूनी मान्यता प्रदान की। यह एक्ट कंपनी के शासन में निरंतरता बनाए रखने के लिए लाया गया था, न कि किसी क्रांतिकारी बदलाव के लिए।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1793 के अधिनियम की आवश्यकता क्यों पड़ी?

1793 के अधिनियम को समझने के लिए हमें उस समय की परिस्थितियों को देखना होगा:

  1. रेगुलेटिंग एक्ट की समाप्ति: 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट ने कंपनी को 20 साल के लिए व्यापारिक अधिकार दिए थे। 1793 में यह अवधि समाप्त हो रही थी, इसलिए चार्टर को रिन्यू करना अनिवार्य था।
  2. लॉर्ड कॉर्नवालिस के सुधार: कॉर्नवालिस ने भारत में पुलिस, न्यायपालिका और राजस्व (स्थायी बंदोबस्त) में व्यापक सुधार किए थे। ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि इन सुधारों को भविष्य के गवर्नर-जनरलों के लिए एक मानक (Standard) बना दिया जाए।
  3. ब्रिटेन में स्थिति: उस समय ब्रिटेन फ्रांस के साथ युद्ध में उलझा हुआ था (नेपोलियन के उदय से पूर्व की स्थिति)। ब्रिटिश सरकार का ध्यान यूरोप पर था, इसलिए वे भारत के प्रशासन में कोई बहुत बड़ा फेरबदल करके जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। वे 'यथास्थिति' (Status Quo) के पक्ष में थे।

इन परिस्थितियों में, संसद ने कंपनी के अधिकारों को अगले 20 वर्षों तक बढ़ाने का निर्णय लिया।

1793 के चार्टर एक्ट के मुख्य प्रावधान (Key Provisions)

हालांकि यह एक्ट बहुत क्रांतिकारी नहीं दिखता, लेकिन इसके प्रावधानों ने भारत की औपनिवेशिक गुलामी की जंजीरों को और कस दिया। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

1. कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार का विस्तार

इस अधिनियम ने ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत के साथ व्यापार करने के लिए अगले 20 वर्षों का और समय दे दिया। इसका अर्थ था कि 1813 तक कोई अन्य ब्रिटिश व्यापारी या कंपनी भारत के साथ सीधा व्यापार नहीं कर सकती थी।

  • हालांकि, इसमें एक छोटा बदलाव किया गया। 'विशेषाधिकार व्यापार' (Privilege Trade) की अवधारणा शुरू की गई, जिसके तहत कंपनी के जहाजों में प्रति वर्ष 3,000 टन माल निजी व्यापारियों द्वारा ले जाने की अनुमति दी गई। यह 1813 में आने वाले 'मुक्त व्यापार' की ओर पहला, बहुत छोटा कदम था।

2. भारतीय राजस्व से वेतन भुगतान (धन की निकासी की शुरुआत)

यह इस एक्ट का सबसे विवादास्पद और भारत के लिए सबसे हानिकारक प्रावधान था।

  • एक्ट में यह नियम बनाया गया कि 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' (Board of Control) के सदस्यों और उनके कर्मचारियों का वेतन अब भारतीय राजस्व (Indian Revenue) से दिया जाएगा।
  • पहले इनका वेतन ब्रिटिश सरकार देती थी।
  • यह व्यवस्था 1919 के अधिनियम तक जारी रही। इसने भारत से धन की निकासी (Drain of Wealth) को वैधानिक रूप दे दिया, जिससे करोड़ों रुपये हर साल भारत से ब्रिटेन भेजे जाने लगे, बिना भारत को कोई प्रत्यक्ष लाभ मिले।
  • कंपनी को यह भी निर्देश दिया गया कि अपने सभी खर्चे और लाभांश (10%) चुकाने के बाद, उसे ब्रिटिश सरकार को सालाना 5 लाख पाउंड का भुगतान करना होगा।

3. गवर्नर-जनरल की शक्तियों में वृद्धि

लॉर्ड कॉर्नवालिस ने गवर्नर-जनरल का पद स्वीकार करने के लिए विशेष शक्तियों की मांग की थी (जैसे अपनी परिषद/Council के निर्णय को वीटो करना)। 1793 के एक्ट ने इन शक्तियों को भविष्य के सभी गवर्नर-जनरलों और गवर्नरों तक विस्तारित कर दिया।

  • वीटो पावर: गवर्नर-जनरल अब विशेष परिस्थितियों में अपनी कार्यकारी परिषद (Executive Council) के बहुमत के निर्णय को रद्द कर सकता था।
  • प्रेसिडेंसियों पर नियंत्रण: बंगाल के गवर्नर-जनरल का बंबई (Mumbai) और मद्रास (Chennai) की प्रेसिडेंसियों पर नियंत्रण और कड़ा कर दिया गया। जब भी गवर्नर-जनरल मद्रास या बंबई जाता, तो वह वहां के स्थानीय गवर्नर के अधिकारों का अधिग्रहण (Supersede) कर सकता था।
  • गवर्नर-जनरल की अनुपस्थिति में परिषद के एक नागरिक सदस्य (Civilian Member) को उप-राष्ट्रपति नियुक्त करने का प्रावधान किया गया।

4. न्यायपालिका और राजस्व का पृथक्करण

इस एक्ट ने 'कॉर्नवालिस कोड' (Cornwallis Code) को संस्थागत रूप दिया।

  • जिला कलेक्टर की शक्तियां सीमित: पहले जिला कलेक्टर के पास राजस्व (Revenue) वसूलने और न्याय (Justice) करने, दोनों की शक्ति होती थी। इस एक्ट ने कलेक्टर से न्यायिक शक्तियां छीन लीं।
  • अब कलेक्टर का काम केवल राजस्व वसूली था। न्याय के लिए अलग से जिला न्यायाधीश (District Judges) की नियुक्ति की गई।
  • माल अदालतें (Mal Adalats): राजस्व संबंधी मामलों के लिए अलग 'माल अदालतों' को समाप्त कर दिया गया और ये मामले अब सामान्य दीवानी अदालतों में लाए जाने लगे।

5. अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान

  • वरिष्ठ अधिकारी: गवर्नर-जनरल, गवर्नरों और कमांडर-इन-चीफ के पदों पर नियुक्ति के लिए शाही स्वीकृति अनिवार्य कर दी गई। साथ ही, कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों को बिना अनुमति भारत छोड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। अगर वे ऐसा करते, तो इसे उनका 'इस्तीफा' माना जाता।
  • शराब पर रोक: इस एक्ट ने प्रशासन को शराब की बिक्री के लिए लाइसेंस (Licensing) जारी करने का अधिकार दिया, ताकि नशीले पदार्थों के सेवन को नियंत्रित किया जा सके।
  • लिखित कानून: पहली बार यह तय किया गया कि सभी कानूनों और विनियमों का अनुवाद भारतीय भाषाओं में किया जाएगा और उन्हें लिखित रूप में प्रकाशित किया जाएगा, ताकि लोग अपने अधिकारों को जान सकें (हालांकि यह मुख्य रूप से अदालतों के संदर्भ में था)।

चार्टर एक्ट 1793 का महत्व और प्रभाव

1793 का चार्टर अधिनियम भले ही शांत दिखाई देता हो, लेकिन इसका प्रभाव गहरा था:

  1. संवैधानिक निरंतरता: इसने भारत में लिखित कानूनों और नियमों (Rule of Law) की अवधारणा को मजबूत किया। इसने यह स्थापित किया कि भारत का शासन व्यक्तिगत सनक से नहीं, बल्कि संसदीय कानूनों से चलेगा।
  2. नौकरशाही का ढांचा: इसने भारतीय सिविल सेवा (ICS) के ढांचे को मजबूत किया। वरिष्ठ पदों पर केवल 'अनुबंधबद्ध' (Covenanted) सेवकों की ही नियुक्ति हो सकती थी, जो कि पूरी तरह से यूरोपीय होते थे। इसने भारतीयों को उच्च पदों से पूरी तरह बाहर कर दिया।
  3. एकीकरण: इसने बंगाल के गवर्नर-जनरल के अधीन भारत के प्रशासन को और अधिक एकीकृत (Centralized) किया।

अधिनियम की कमियां और आलोचना

इस अधिनियम की सबसे बड़ी आलोचना इसकी औपनिवेशिक मानसिकता को लेकर होती है।

  • आर्थिक शोषण: बोर्ड ऑफ कंट्रोल के वेतन का भार भारतीयों पर डालना सरासर अन्याय था। यह भारतीय गरीबी का एक बड़ा कारण बना।
  • भारतीयों की उपेक्षा: इस एक्ट में भारतीयों के लिए शिक्षा, रोजगार या प्रशासन में भागीदारी का कोई प्रावधान नहीं था। यह पूरी तरह से कंपनी के मुनाफे और ब्रिटिश हितों के लिए बनाया गया था।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः, चार्टर एक्ट 1793 एक "समेकन अधिनियम" (Act of Consolidation) था। इसने कुछ नया शुरू करने के बजाय, 1773 और 1784 के अधिनियमों द्वारा स्थापित व्यवस्था को मजबूत किया। इसने ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत के भाग्य का स्वामी अगले 20 वर्षों के लिए पुनः घोषित कर दिया।

हालांकि, इसमें निहित "धन की निकासी" और "केंद्रीकृत शासन" के बीजों ने भविष्य के भारत में ब्रिटिश विरोध की आधारशिला भी रखी। यह एक्ट एक शांत समुद्र की तरह था, जिसके नीचे शोषण की लहरें उफान मार रही थीं, जो अंततः 1857 की क्रांति के रूप में सामने आईं।

चार्टर एक्ट 1793 से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न: चार्टर एक्ट 1793 के समय भारत का गवर्नर-जनरल कौन था?

उत्तर: जब यह एक्ट तैयार हो रहा था तब लॉर्ड कॉर्नवालिस (Lord Cornwallis) गवर्नर-जनरल थे, लेकिन एक्ट लागू होने के समय सर जॉन शोर (Sir John Shore) ने पदभार संभाला।

प्रश्न: चार्टर एक्ट 1793 की सबसे विवादास्पद विशेषता क्या थी?

उत्तर: सबसे विवादास्पद विशेषता यह थी कि 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' के सदस्यों और कर्मचारियों का वेतन अब भारतीय राजस्व से दिया जाना तय हुआ, जिससे भारत से धन की निकासी बढ़ गई।

प्रश्न: क्या 1793 के एक्ट ने कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार खत्म किया?

उत्तर: नहीं, इसने कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार (Monopoly) को अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ा दिया। एकाधिकार को आंशिक रूप से 1813 में और पूर्ण रूप से 1833 में समाप्त किया गया।

प्रश्न: न्यायपालिका और राजस्व प्रशासन को किस एक्ट द्वारा अलग किया गया?

उत्तर: चार्टर एक्ट 1793 ने कॉर्नवालिस के सुधारों को लागू करते हुए जिला कलेक्टर से न्यायिक शक्तियाँ छीनकर उसे केवल राजस्व तक सीमित कर दिया।

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