Charter Act 1853 in Hindi: विशेषताएँ और प्रावधान

भारतीय संवैधानिक विकास के इतिहास में चार्टर एक्ट 1853 (Charter Act 1853) का एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह ब्रिटिश संसद द्वारा पारित चार्टर अधिनियमों की श्रृंखला में अंतिम अधिनियम था। इस एक्ट ने न केवल ईस्ट इंडिया कंपनी के भविष्य पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया, बल्कि इसने भारत में एक संगठित विधायी और प्रशासनिक ढांचे की शुरुआत भी की। यह वह निर्णायक मोड़ था जहाँ से भारत का शासन कंपनी के हाथों से फिसलकर सीधे ब्रिटिश क्राउन (ताज) के पास जाने की पृष्ठभूमि तैयार हुई।

                                                           

Charter Act 1853 in Hindi: विशेषताएँ और प्रावधान



1853 तक, भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को लेकर ब्रिटेन में भी सवाल उठने लगे थे। 1800 से 1850 के बीच की राजनीतिक घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया था कि एक व्यापारिक कंपनी इतने विशाल भारतीय उपमहाद्वीप का प्रशासन कुशलता से नहीं चला सकती। इसी संदर्भ में, 1853 का चार्टर एक्ट लाया गया, जिसने कई दूरगामी परिवर्तन किए।

आइए, इस लेख में हम 1853 के चार्टर एक्ट के प्रमुख प्रावधानों, इसकी विशेषताओं और भारतीय इतिहास पर इसके गहरे प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण करते हैं।

विषय सूची (Table of Contents)


चार्टर एक्ट 1853 की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

1853 का चार्टर एक्ट समझने के लिए, हमें इससे पहले के एक्ट्स को संक्षेप में जानना होगा। 1793, 1813 और 1833 में, ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में शासन करने और व्यापार करने के लिए 20-20 वर्षों का चार्टर (अधिकार पत्र) दिया जाता था। 1833 के एक्ट ने कंपनी से उसके व्यापारिक अधिकार (चीन के साथ चाय का व्यापार भी) पूरी तरह छीन लिए थे और उसे विशुद्ध रूप से एक प्रशासनिक निकाय बना दिया था।

जब 1853 में 20 साल की यह अवधि समाप्त होने वाली थी, तब ब्रिटिश संसद में जोरदार बहस छिड़ी। कई सांसद कंपनी के कुशासन, भ्रष्टाचार और अक्षमता के कारण भारत का नियंत्रण सीधे क्राउन को सौंपने के पक्ष में थे। दूसरी ओर, कंपनी अपने शासन को जारी रखने के लिए लॉबिंग कर रही थी।

इसी बहस के बीच, लॉर्ड डलहौजी (तत्कालीन गवर्नर-जनरल) द्वारा भेजे गए सुधारों और एक प्रवर समिति (Select Committee) की रिपोर्टों के आधार पर 1853 का यह अधिनियम पारित किया गया। यह एक्ट एक तरह का समझौता था, जिसने कंपनी को शासन तो दिया, लेकिन उसकी डोर पूरी तरह से ब्रिटिश संसद के हाथों में थमा दी।

चार्टर एक्ट 1853 के प्रमुख प्रावधान और विशेषताएं

1853 के चार्टर एक्ट ने भारतीय प्रशासन की संरचना में कई बुनियादी और महत्वपूर्ण बदलाव किए। इसके प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित थे:

1. कंपनी के शासन का अनिश्चितकालीन विस्तार

यह इस एक्ट का सबसे महत्वपूर्ण और सांकेतिक प्रावधान था। पिछले चार्टरों के विपरीत, जहाँ कंपनी को 20 वर्षों का निश्चित कार्यकाल मिलता था, वहीं 1853 के एक्ट ने कंपनी को भारतीय क्षेत्रों का प्रशासन "जब तक संसद चाहे" तब तक के लिए दे दिया।

  • इसका सीधा मतलब था कि ब्रिटिश सरकार अब किसी भी समय, बिना 20 साल इंतजार किए, कंपनी से सत्ता छीन सकती थी।
  • इसने कंपनी के शासन को "ट्रस्टी" (Trustee) के रूप में स्थापित कर दिया, जो क्राउन की ओर से भारत का प्रशासन देख रही थी।
  • यह प्रावधान स्पष्ट रूप से कंपनी के शासन के अंत का संकेत दे रहा था, जो केवल 5 साल बाद 1857 के विद्रोह के पश्चात् 1858 में सच साबित हुआ।

2. विधायी और कार्यकारी कार्यों का पृथक्करण (मिनी-संसद)

इस एक्ट से पहले, गवर्नर-जनरल और उसकी कार्यकारी परिषद (Executive Council) ही कानून बनाने का काम भी करती थी। 1853 के एक्ट ने पहली बार गवर्नर-जनरल की परिषद के विधायी (Legislative) और कार्यकारी (Executive) कार्यों को अलग कर दिया

  • कानून बनाने के लिए परिषद में 6 नए सदस्यों को जोड़ा गया, जिन्हें "विधान पार्षद" (Legislative Councillors) कहा गया।
  • इस प्रकार, गवर्नर-जनरल की विधायी परिषद (Legislative Council) की स्थापना हुई, जिसमें कुल 12 सदस्य हो गए (गवर्नर-जनरल, कमांडर-इन-चीफ, कार्यकारी परिषद के 4 सदस्य और 6 नए विधान पार्षद)।
  • इस नई विधायी परिषद ने एक "छोटी संसद" (Mini-Parliament) की तरह काम करना शुरू कर दिया। इसमें भी ब्रिटिश संसद के समान ही बहस, चर्चा और मतदान की प्रक्रिया अपनाई गई।
  • यह भारत में संसदीय प्रणाली की नींव का पहला पत्थर माना जाता है।

3. सिविल सेवाओं में खुली प्रतियोगिता की शुरुआत

Charter Act 1853 in Hindi: विशेषताएँ और प्रावधान


यह भारतीय प्रशासन के लिए एक क्रांतिकारी कदम था। 1833 के एक्ट में सिविल सेवकों के चयन के लिए खुली प्रतियोगिता का प्रयास किया गया था, लेकिन कंपनी के निदेशक मंडल (Court of Directors) के विरोध के कारण यह लागू नहीं हो पाया था।

  • 1853 के एक्ट ने निदेशक मंडल के "संरक्षण" (Patronage) के अधिकार को समाप्त कर दिया। पहले, डायरेक्टर अपने पसंदीदा लोगों को नामांकित (Nominate) करके सिविल सेवा में भेजते थे।
  • अब, भारतीय सिविल सेवा (Indian Civil Service - ICS) में भर्ती पूरी तरह से खुली प्रतियोगी परीक्षा के आधार पर होने लगी।
  • यह परीक्षा सभी ब्रिटिश प्रजा (भारतीयों सहित) के लिए खोल दी गई। हालांकि, परीक्षा का लंदन में होना, पाठ्यक्रम का यूरोपीय-केंद्रित होना और आयु सीमा जैसी बाधाओं के कारण भारतीयों के लिए इसमें सफल होना बेहद कठिन था।

4. निदेशक मंडल (Court of Directors) की शक्तियों में कमी

कंपनी के मामलों को नियंत्रित करने वाले निदेशक मंडल की ताकत को भी इस एक्ट के जरिए कम कर दिया गया।

  • निदेशकों की संख्या 24 से घटाकर 18 कर दी गई।
  • इन 18 में से 6 निदेशकों की नियुक्ति ब्रिटिश क्राउन (Crown) द्वारा की जानी थी।
  • यह कदम कंपनी के प्रबंधन पर ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण को और मजबूत करने के लिए उठाया गया था।

5. प्रांतीय प्रतिनिधित्व का समावेश

गवर्नर-जनरल की नई विधायी परिषद (जो 6 नए सदस्यों से बनी थी) में पहली बार स्थानीय (प्रांतीय) प्रतिनिधित्व को शामिल किया गया।

  • इन 6 विधान पार्षदों में से 4 को बंगाल, मद्रास, बॉम्बे (मुंबई) और आगरा की प्रांतीय सरकारों द्वारा नियुक्त किया जाना था।
  • अन्य दो सदस्य थे - कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक अन्य न्यायाधीश।
  • हालांकि यह प्रतिनिधित्व बहुत सीमित था और इसमें कोई भारतीय नहीं था, फिर भी यह भारत में शक्तियों के विकेंद्रीकरण (Decentralization) की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक कदम था।

6. बंगाल के लिए अलग लेफ्टिनेंट-गवर्नर

1833 के एक्ट ने बंगाल के गवर्नर को "भारत का गवर्नर-जनरल" बना दिया था। इससे उस पर पूरे भारत के साथ-साथ बंगाल के प्रशासन का भी दोहरा बोझ आ गया था। 1853 के एक्ट ने इस समस्या का समाधान करते हुए बंगाल प्रेसीडेंसी के लिए एक अलग लेफ्टिनेंट-गवर्नर (Lieutenant-Governor) नियुक्त करने का प्रावधान किया। इससे गवर्नर-जनरल अपना पूरा ध्यान भारत के प्रशासन पर केंद्रित कर सका।


चार्टर एक्ट 1853 का महत्व और प्रभाव

चार्टर एक्ट 1853 केवल एक नियमित नवीनीकरण नहीं था; यह कई मायनों में ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण था:

  1. आधुनिक विधायी ढांचा: इसने पहली बार स्पष्ट रूप से विधायी (कानून बनाने) और कार्यकारी (कानून लागू करने) शक्तियों को अलग किया। यह भारत में आधुनिक संसदीय लोकतंत्र के विकास का पहला चरण था।
  2. कंपनी के शासन का अंत: इसने कंपनी के शासन को किसी निश्चित समय-सीमा के बिना "ब्रिटिश क्राउन के विश्वास" पर छोड़ दिया, जिसने 1858 में सत्ता के हस्तांतरण को कानूनी रूप से आसान बना दिया।
  3. योग्यता आधारित प्रशासन: सिविल सेवाओं में खुली प्रतियोगिता शुरू करके, इसने भाई-भतीजावाद (Patronage) को समाप्त किया और योग्यता (Meritocracy) को प्रशासन का आधार बनाया। इसने भारतीयों के लिए भी (सैद्धांतिक रूप से) प्रशासन के उच्चतम पदों का मार्ग खोल दिया।
  4. संकेत: यह एक्ट स्पष्ट संकेत था कि ब्रिटिश संसद अब भारतीय मामलों पर अपना सीधा नियंत्रण बढ़ा रही है और कंपनी का एकाधिकार जल्द ही समाप्त होने वाला है।

मैकाले समिति (1854) और सिविल सेवा

1853 के चार्टर एक्ट के प्रावधानों को लागू करने के लिए, 1854 में लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में "भारतीय सिविल सेवा पर समिति" (Macaulay Committee) का गठन किया गया।

  • इसी समिति की सिफारिशों के आधार पर भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं का ढांचा तैयार किया गया।
  • मैकाले का मानना था कि प्रशासन को "योग्यता" पर आधारित होना चाहिए, न कि "जन्म" या "सिफारिश" पर।
  • हालांकि उनकी सिफारिशों ने एक कुशल नौकरशाही बनाने में मदद की, लेकिन उन्होंने जानबूझकर पाठ्यक्रम को ऐसा रखा कि केवल ब्रिटिश या ब्रिटिश शिक्षा प्राप्त कुलीन भारतीय ही इसमें सफल हो सकें।

कंपनी शासन के अंत की शुरुआत

1853 का चार्टर एक्ट, ईस्ट इंडिया कंपनी के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ। इसने कंपनी को ब्रिटिश संसद की "इच्छा" पर निर्भर बना दिया। जब 1857 में भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (या सिपाही विद्रोह) हुआ, तो ब्रिटिश सरकार को वह बहाना मिल गया जिसकी उसे तलाश थी।

कंपनी के कुशासन को विद्रोह का कारण बताते हुए, ब्रिटिश संसद ने 1858 में "भारत सरकार अधिनियम" (Government of India Act 1858) पारित किया। इस नए कानून ने ईस्ट इंडिया कंपनी को पूरी तरह से भंग कर दिया और भारत का शासन सीधे ब्रिटिश महारानी (क्राउन) के हाथों में सौंप दिया। 1853 के एक्ट द्वारा बनाई गई अनिश्चितता की स्थिति 1858 में समाप्त हो गई।

निष्कर्ष

चार्टर एक्ट 1853 (Charter Act 1853) को भारतीय संवैधानिक इतिहास में एक "सीमाचिह्न" (Landmark) माना जाता है। यह अंतिम चार्टर एक्ट था और इसने ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के पतन की औपचारिक शुरुआत की।

इस एक्ट द्वारा किए गए सुधार— जैसे विधायी परिषद की स्थापना (मिनी-संसद), सिविल सेवाओं में खुली प्रतियोगिता, और प्रांतीय प्रतिनिधित्व की हल्की सी शुरुआत— ने भविष्य के भारतीय संविधान निर्माण की प्रक्रिया के लिए एक आधार तैयार किया। भले ही ये सुधार ब्रिटिश हितों को ध्यान में रखकर किए गए थे, लेकिन अनजाने में ही इन्होंने भारत में एक आधुनिक, केन्द्रीकृत और योग्यता-आधारित प्रशासनिक प्रणाली की नींव रखी, जिसका प्रभाव आज भी भारत के संविधान और शासन प्रणाली में देखा जा सकता है।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: 1853 का चार्टर एक्ट क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर: यह एक्ट तीन मुख्य कारणों से महत्वपूर्ण है: 1) यह ब्रिटिश संसद द्वारा पारित अंतिम चार्टर एक्ट था। 2) इसने पहली बार गवर्नर-जनरल की परिषद के विधायी और कार्यकारी कार्यों को अलग किया। 3) इसने भारतीय सिविल सेवा में भर्ती के लिए खुली प्रतियोगी परीक्षा की शुरुआत की और कंपनी के संरक्षण को समाप्त कर दिया।

प्रश्न 2: अंतिम चार्टर एक्ट कौनसा था?
उत्तर: 1853 का चार्टर एक्ट (Charter Act 1853) ईस्ट इंडिया कंपनी को जारी किया गया अंतिम चार्टर एक्ट था। इसके बाद 1858 में भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन ने अपने हाथ में ले लिया।

प्रश्न 3: 1853 के एक्ट ने सिविल सेवा में क्या बदलाव किया?
उत्तर: इस एक्ट ने सिविल सेवा में भर्ती के लिए "संरक्षण" (Patronage) प्रणाली को समाप्त कर दिया और "खुली प्रतियोगी परीक्षा" (Open Competition) की शुरुआत की, जो भारतीयों सहित सभी के लिए खुली थी। इसे लागू करने के लिए 1854 में मैकाले समिति का गठन किया गया।

प्रश्न 4: 1853 के एक्ट द्वारा बनाई गई 'मिनी-पार्लियामेंट' क्या थी?
उत्तर: इस एक्ट ने कानून बनाने के लिए गवर्नर-जनरल की परिषद में 6 नए विधान पार्षद जोड़े। इस 12-सदस्यीय परिषद को 'भारतीय (केंद्रीय) विधान परिषद' कहा गया। यह ब्रिटिश संसद की तर्ज पर काम करती थी, जहाँ प्रस्तावों पर बहस होती थी, इसलिए इसे 'मिनी-पार्लियामेंट' या छोटी संसद कहा गया।

प्रश्न 5: 1853 के एक्ट ने कंपनी के शासन को कैसे प्रभावित किया?
उत्तर: इस एक्ट ने कंपनी के शासन को 20 वर्षों के लिए बढ़ाने के बजाय, उसे "जब तक संसद चाहे" तब तक के लिए बढ़ा दिया। इसने कंपनी को ब्रिटिश क्राउन के एक ट्रस्टी (अमानतदार) में बदल दिया और यह स्पष्ट कर दिया कि कंपनी का शासन जल्द ही समाप्त किया जा सकता है।

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