लेख का सार: भारत और पाकिस्तान के इतिहास में 1950 का वर्ष अत्यंत नाज़ुक था। विभाजन की आग ठंडी भी नहीं हुई थी कि दोनों देश एक बार फिर युद्ध की कगार पर खड़े थे। ऐसे में नेहरू-लियाकत समझौता (Nehru-Liaquat Pact 1950) एक ऐतिहासिक कूटनीतिक प्रयास बनकर उभरा। इस लेख में हम इस समझौते की गहराई, इसके कारण, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का विरोध और इसके दीर्घकालिक प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण करेंगे। यह लेख प्रतियोगी परीक्षाओं और इतिहास प्रेमियों के लिए एक सम्पूर्ण दस्तावेज है।
चित्र: भारत और पाकिस्तान के बीच ऐतिहासिक समझौते का प्रतीकात्मक चित्रण
1. प्रस्तावना: विभाजन के बाद का संकट
15 अगस्त 1947 को भारत का विभाजन हुआ, जो मानव इतिहास के सबसे बड़े विस्थापन और त्रासदियों में से एक था। रेडक्लिफ रेखा ने जमीन को तो बांट दिया, लेकिन दिलों में नफरत की जो लकीर खींची गई थी, वह मिटने का नाम नहीं ले रही थी। 1947 के बाद भी, दोनों नवजात राष्ट्र—भारत और पाकिस्तान—असुरक्षा, अविश्वास और साम्प्रदायिक हिंसा के साये में जी रहे थे।
लाखों शरणार्थी अपना सब कुछ खोकर सीमाओं के आर-पार जा रहे थे। भारत में मुसलमान और पाकिस्तान में हिंदू व सिख अल्पसंख्यक बनकर रह गए थे। उनकी सुरक्षा एक ऐसा प्रश्न था जिसका उत्तर अगर समय रहते न खोजा जाता, तो पूरा उपमहाद्वीप एक और भीषण रक्तपात का गवाह बनता। इसी उथल-पुथल के बीच, शांति की एक किरण के रूप में 8 अप्रैल 1950 को एक ऐतिहासिक दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए गए, जिसे इतिहास 'नेहरू-लियाकत समझौता' या 'दिल्ली पैक्ट' के नाम से जानता है। यह समझौता सिर्फ दो नेताओं का मिलन नहीं, बल्कि दो देशों की भविष्य की दिशा तय करने वाला एक प्रयास था।
2. 1950 का संकट: समझौते की पृष्ठभूमि
अक्सर यह समझा जाता है कि 1947 के बाद हिंसा थम गई थी, लेकिन यह सत्य नहीं है। नेहरू-लियाकत समझौते की असली वजह 1949 के अंत और 1950 की शुरुआत में पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) और पश्चिम बंगाल में भड़की भयानक हिंसा थी।
खुलना के दंगे और प्रतिक्रिया
दिसंबर 1949 में पूर्वी पाकिस्तान के खुलना (Khulna) जिले में एक छोटी सी घटना ने उग्र रूप ले लिया। पुलिस द्वारा कम्युनिस्टों की तलाश के दौरान हुई कार्रवाई को धार्मिक रंग दे दिया गया, जिसके बाद वहां के हिंदुओं पर व्यापक अत्याचार शुरू हो गए। हिंदुओं की संपत्ति लूटी गई और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया गया।
इसकी प्रतिक्रिया पश्चिम बंगाल में हुई। जब पूर्वी पाकिस्तान से लुटे-पिटे हिंदू शरणार्थी कलकत्ता (अब कोलकाता) पहुंचे, तो उनकी आपबीती सुनकर भारत में रोष फैल गया। इसके परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा भड़क उठी। फरवरी-मार्च 1950 तक स्थिति इतनी भयावह हो गई कि ऐसा लगने लगा कि 1947 का खूनी इतिहास फिर से दोहराया जाएगा। लाखों की संख्या में फिर से पलायन शुरू हो गया था।
3. युद्ध के बादल और कूटनीतिक पहल
1950 के शुरुआती महीनों में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध के बादल मंडराने लगे थे। भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू पर भारी दबाव था कि वे पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करें ताकि वहां के अल्पसंख्यकों (विशेषकर हिंदुओं) को बचाया जा सके। सरदार वल्लभभाई पटेल ने भी चेतावनी दी थी कि पाकिस्तान को अपने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।
हालाँकि, नेहरू युद्ध के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि एक और युद्ध दोनों देशों की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने को पूरी तरह नष्ट कर देगा। इसी विचार के साथ, उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को बातचीत का न्योता दिया। लियाकत अली खान दिल्ली आए और 2 अप्रैल 1950 को दोनों नेताओं के बीच मैराथन वार्ता शुरू हुई। छह दिनों की गहन चर्चा के बाद, 8 अप्रैल 1950 को इस ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर हुए।
4. नेहरू-लियाकत समझौते के प्रमुख प्रावधान
यह समझौता (Bill of Rights for Minorities) के रूप में देखा गया। इसके तहत दोनों सरकारों ने एक-दूसरे के देश में रहने वाले अल्पसंख्यकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी स्वीकार की। इसके मुख्य बिंदु और प्रावधान निम्नलिखित थे:
- नागरिकता और समानता: दोनों सरकारों ने यह वचन दिया कि वे अपने अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों के समान ही नागरिकता के अधिकार प्रदान करेंगी। धर्म के आधार पर सरकारी नौकरियों, राजनीति या व्यवसाय में कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।
- जान-माल की सुरक्षा: अल्पसंख्यकों के जीवन, संस्कृति, संपत्ति और व्यक्तिगत सम्मान (विशेषकर महिलाओं के सम्मान) की रक्षा करना सरकार का प्राथमिक कर्तव्य होगा।
- आवागमन की स्वतंत्रता: विस्थापित लोगों को अपने देश लौटने या अपनी संपत्ति बेचने और अपने साथ नकदी व जेवर ले जाने की अनुमति दी गई। पहले इस पर कड़े प्रतिबंध थे।
- संपत्ति की वापसी: जो लोग दंगों के कारण 1950 में अपना घर छोड़कर भागे थे, यदि वे 31 दिसंबर 1950 तक वापस लौटते हैं, तो उन्हें उनकी अचल संपत्ति वापस दी जाएगी।
- जबरन धर्म परिवर्तन पर रोक: दोनों देशों ने यह स्वीकार किया कि दंगों के दौरान हुए जबरन धर्म परिवर्तन को मान्यता नहीं दी जाएगी और अपहृत महिलाओं को उनके परिवारों तक वापस पहुँचाया जाएगा।
- अल्पसंख्यक आयोग का गठन: समझौते के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए पूर्वी पाकिस्तान, पश्चिम बंगाल और असम में प्रांतीय स्तर पर अल्पसंख्यक आयोग (Minority Commissions) का गठन किया गया।
- मंत्रियों की नियुक्ति: यह तय किया गया कि दोनों देशों की सरकारों में एक-एक मंत्री विशेष रूप से अल्पसंख्यक मामलों को देखेगा और विवादित क्षेत्रों का दौरा करेगा।
5. डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का इस्तीफा और विरोध
नेहरू-लियाकत समझौता भारतीय राजनीति में एक बड़े भूचाल का कारण भी बना। इस समझौते का सबसे मुखर विरोध नेहरू के अपने ही मंत्रिमंडल के भीतर से हुआ। उद्योग और आपूर्ति मंत्री डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और वाणिज्य मंत्री के.सी. नियोगी (K.C. Neogy) ने इस समझौते के विरोध में अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यह भारतीय संसदीय इतिहास की एक बड़ी घटना थी।
डॉ. मुखर्जी के विरोध के मुख्य कारण:
- पाकिस्तान पर अविश्वास: डॉ. मुखर्जी का मानना था कि पाकिस्तान एक "इस्लामिक स्टेट" है और वह कभी भी हिंदुओं को समान अधिकार नहीं देगा। उनका कहना था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में अपने वादे निभाएगा, लेकिन पाकिस्तान केवल हस्ताक्षर करेगा और पालन नहीं करेगा।
- तुष्टीकरण की नीति: उन्होंने इसे पाकिस्तान के प्रति भारत की तुष्टीकरण की नीति (Appeasement Policy) करार दिया। उनका मानना था कि पाकिस्तान के अपराधों को माफ कर भारत कमजोरी दिखा रहा है।
- खंडित समाधान: मुखर्जी का तर्क था कि यह समझौता समस्या की जड़ (पाकिस्तान का निर्माण और वहां की विचारधारा) का समाधान नहीं करता, बल्कि केवल लक्षणों का इलाज करने की कोशिश है।
डॉ. मुखर्जी के इस्तीफे ने बाद में 'भारतीय जनसंघ' की स्थापना की नींव रखी, जो आज की भारतीय जनता पार्टी (BJP) का पूर्ववर्ती संगठन है। यह दर्शाता है कि यह समझौता भारतीय राजनीति को किस हद तक प्रभावित कर गया।
6. समझौते का महत्व और उद्देश्य
तमाम विरोधों के बावजूद, इस समझौते का तात्कालिक महत्व नकारा नहीं जा सकता। इसका सबसे बड़ा उद्देश्य 'युद्ध को टालना' था। 1950 में यदि युद्ध होता, तो वह 1947 से भी अधिक विनाशकारी होता।
- मानवीय दृष्टिकोण: इसने पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा एक मानवाधिकार मुद्दा है, न कि केवल आंतरिक मामला।
- मीडिया पर नियंत्रण: समझौते में यह भी शामिल था कि दोनों देश अपनी मीडिया और प्रचार तंत्र को एक-दूसरे के खिलाफ नफरत फैलाने से रोकेंगे, जिससे माहौल शांत हो सके।
- शरणार्थी संकट का प्रबंधन: इसने शरणार्थियों के लिए 'वीज़ा प्रणाली' और सुरक्षित आवागमन के नियम बनाए, जिससे अराजकता कम हुई।
7. परिणाम: क्या समझौता सफल रहा?
नेहरू-लियाकत समझौते की सफलता और विफलता का आकलन एक मिश्रित तस्वीर पेश करता है।
सकारात्मक पक्ष: समझौते के तुरंत बाद, 1950 के मध्य तक साम्प्रदायिक हिंसा में भारी कमी आई। लगभग दस लाख से अधिक शरणार्थी अपने घरों को लौट सके। कुछ समय के लिए दोनों देशों के संबंधों में सुधार हुआ और व्यापार भी शुरू हुआ।
नकारात्मक पक्ष (विफलता): दीर्घकालिक रूप से, डॉ. मुखर्जी की आशंकाएं सही साबित हुईं। पाकिस्तान (विशेषकर पूर्वी पाकिस्तान) में हिंदुओं का उत्पीड़न नहीं रुका। वहां से हिंदुओं का पलायन लगातार जारी रहा, जो अंततः 1971 के मुक्ति संग्राम और बांग्लादेश के निर्माण का एक प्रमुख कारण बना। भारत ने अपने संविधान के तहत अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दी, लेकिन पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरवाद हावी रहा, जिससे समझौते की मूल भावना वहां दम तोड़ गई।
8. ऐतिहासिक आलोचना और निष्कर्ष
इतिहासकारों की नजर में नेहरू-लियाकत समझौता एक 'अच्छी नीयत लेकिन कमजोर क्रियान्वयन' का उदाहरण है। आलोचक इसे भारत की कूटनीतिक हार मानते हैं क्योंकि इसने पाकिस्तान को अपनी जिम्मेदारी से बचने का मौका दे दिया। वहीं, समर्थक इसे नेहरू की दूरदर्शिता मानते हैं जिसने उस वक्त लाखों जानें बचाईं।
निष्कर्षतः, 1950 का दिल्ली समझौता भारत और पाकिस्तान के बीच सह-अस्तित्व की एक गंभीर कोशिश थी। इसने यह स्थापित किया कि एक सभ्य राष्ट्र की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों (अल्पसंख्यकों) के साथ कैसा व्यवहार करता है। आज भी जब नागरिकता संशोधन कानून (CAA) या अन्य मुद्दों पर बहस होती है, तो नेहरू-लियाकत समझौते का जिक्र संदर्भ के रूप में जरूर आता है। यह समझौता याद दिलाता है कि साम्प्रदायिकता की आग को केवल संवाद और विश्वास के पानी से ही बुझाया जा सकता है।
9. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्र.1. नेहरू-लियाकत समझौते पर हस्ताक्षर कब हुए थे?
उत्तर: इस समझौते पर 8 अप्रैल 1950 को नई दिल्ली में हस्ताक्षर किए गए थे।
प्र.2. इस समझौते का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर: 1950 में पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिम बंगाल में हुए भीषण साम्प्रदायिक दंगे और युद्ध की संभावना को टालना इसका मुख्य कारण था।
प्र.3. डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस्तीफा क्यों दिया?
उत्तर: वे इस समझौते के खिलाफ थे। उनका मानना था कि पाकिस्तान अपने वादे पूरे नहीं करेगा और भारत को पाकिस्तान के प्रति सख्त रवैया अपनाना चाहिए, न कि तुष्टीकरण का।
प्र.4. क्या पाकिस्तान ने इस समझौते का पालन किया?
उत्तर: अधिकांश इतिहासकारों और तथ्यों के अनुसार, पाकिस्तान समझौते का पालन करने में विफल रहा, जिसके कारण वहां से अल्पसंख्यकों का पलायन जारी रहा।
प्र.5. 'दिल्ली पैक्ट' किसे कहते हैं?
उत्तर: नेहरू-लियाकत समझौते को ही 'दिल्ली पैक्ट' (Delhi Pact) के नाम से जाना जाता है क्योंकि यह दिल्ली में हस्ताक्षरित हुआ था।
📜 भारत के संविधान और राजनीति से जुड़ी सभी पोस्ट देखें
संविधान के अनुच्छेद, संशोधन, भाग, अनुसूचियाँ और भारतीय राजनीति के हर विषय पर विस्तृत जानकारी — सब कुछ एक ही जगह।
🔗 सम्पूर्ण Sitemap देखें© PrashnaPedia | भारतीय संविधान और राजनीति ज्ञानकोश

0 टिप्पणियाँ