स्वदेशी सोलर पैनल महंगे: राजस्थान में 5 हजार मेगावाट के प्रोजेक्ट्स पर संकट
आज के समय में बिजली की बढ़ती कीमतों और पर्यावरण को बचाने की दिशा में हर कोई सौर ऊर्जा (Solar Energy) की तरफ कदम बढ़ा रहा है। लोग अपने घरों की छतों पर pm सूर्य घर योजना से सोलर पैनल लगाकर न सिर्फ अपना बिजली का बिल जीरो करना चाहते हैं, बल्कि सरकार की महत्वकांक्षी योजनाओं का लाभ भी उठाना चाहते हैं। लेकिन हाल ही में दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट ने सोलर इंडस्ट्री और आम उपभोक्ताओं की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार, स्वदेशी सोलर पैनल (जिन्हें DCR पैनल कहा जाता है) की कीमतों में भारी उछाल आया है। इसके चलते अकेले राजस्थान में करीब 5,000 मेगावाट क्षमता के औद्योगिक और कमर्शियल प्रोजेक्ट्स अटकने की कगार पर आ गए हैं।
एक तरफ जहां सरकार 'पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना' (PM Surya Ghar Yojana) के तहत आम आदमी को सोलर पैनल लगाने के लिए भारी सब्सिडी दे रही है, वहीं दूसरी तरफ बाजार में स्वदेशी पैनल की कमी और उनकी आसमान छूती कीमतों ने इस पूरी प्रक्रिया पर ब्रेक लगा दिया है। आज के इस आर्टिकल में हम विस्तार से आसान और आम बोलचाल की भाषा में समझेंगे कि आखिर यह पूरा मामला क्या है, DCR और Non-DCR पैनल में क्या अंतर है, और इसका आपकी जेब पर क्या सीधा असर पड़ने वाला है।
क्या है डीसीआर (DCR) पॉलिसी और सरकार का नया नियम?
इस पूरे मुद्दे को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि DCR क्या होता है। DCR का फुल फॉर्म है Domestic Content Requirement (डोमेस्टिक कंटेंट रिक्वायरमेंट)। आसान भाषा में समझें तो, ये वो सोलर पैनल होते हैं जिनके अंदर इस्तेमाल होने वाले सोलर सेल और मॉड्यूल पूरी तरह से भारत में ही (स्वदेशी रूप से) बनाए जाते हैं।
केंद्र सरकार ने देश में 'मेक इन इंडिया' (Make in India) को बढ़ावा देने और चीन जैसे देशों पर हमारी निर्भरता को कम करने के उद्देश्य से 1 जून से रूफटॉप सोलर प्रोजेक्ट्स (छत पर लगने वाले सोलर) के लिए DCR यानी स्वदेशी सेल वाले पैनल लगाना अनिवार्य कर दिया था। हालांकि, बाद में इस नियम में कुछ ढील या छूट दी गई, लेकिन पॉलिसी में हुए इस अचानक बदलाव ने पूरे मार्केट का गणित बिगाड़ दिया है।
इस नई पॉलिसी का सबसे ज्यादा असर बड़े निवेशों पर पड़ रहा है। आपको बता दें कि हाल ही में 'राइजिंग राजस्थान' (Rising Rajasthan) समिट के दौरान सोलर सेक्टर में लगभग 28 लाख करोड़ रुपये के एमओयू (MoU) साइन हुए थे। ये प्रोजेक्ट्स राज्य की तस्वीर बदल सकते हैं, लेकिन अब नई डीसीआर पॉलिसी और बाजार में स्वदेशी पैनल की कमी के कारण इन भारी-भरकम निवेशों के अटकने का खतरा मंडराने लगा है। निवेशक अब असमंजस में हैं कि वे प्रोजेक्ट शुरू करें या अभी बाजार के स्थिर होने का इंतजार करें।
विदेशी बनाम स्वदेशी: आम उपभोक्ता की जेब पर कितना बढ़ा बोझ?
जब भी कोई मध्यम वर्गीय परिवार अपने घर पर सोलर पैनल लगवाने का विचार करता है, तो उसका सबसे पहला ध्यान बजट पर होता है। सरकार के नए नियमों के बाद बाजार में स्वदेशी पैनल्स की कीमतें काफी तेजी से बढ़ी हैं। भास्कर की इनसाइट रिपोर्ट यह साफ तौर पर बताती है कि विदेशी पैनल के मुकाबले स्वदेशी (DCR) पैनल अब 9 से 10 हजार रुपये प्रति किलोवाट (KW) तक महंगे हो गए हैं।
आइए इसे एक आसान गणित से समझते हैं:
- अगर आप अपने घर की छत पर लगभग 10 पैनल का एक सामान्य सोलर सेटअप (मान लीजिए 3KW से 5KW) लगवाते हैं, तो पहले के मुकाबले अब आपको इंस्टॉलेशन में करीब 1 लाख रुपये ज्यादा खर्च करने पड़ेंगे।
- अंतर्राष्ट्रीय बाजार (International Market) में अभी सोलर पैनल की कीमत लगभग 12 से 14 रुपये प्रति वॉट चल रही है, जो कि काफी सस्ती है।
- वहीं भारत में स्वदेशी (DCR) पैनल की रेट लगातार बढ़ रही है। हालात ये हैं कि कुछ कंपनियों के पैनल तो 31 से 32 रुपये प्रति वॉट के महंगे भाव पर मिल रहे हैं। यह कीमत विदेशी पैनल के मुकाबले दोगुनी से भी अधिक है।
क्या अब 78,000 रुपये की सरकारी सब्सिडी का फायदा है?
सरकार 'पीएम सूर्य घर योजना' के तहत उपभोक्ताओं को सोलर प्लांट लगाने पर बेहतरीन सब्सिडी दे रही है। यदि कोई उपभोक्ता 6 किलोवाट या उससे बड़ा प्लांट लगाता है, तो उसे अधिकतम 78,000 रुपये की सब्सिडी मिलती है। लेकिन महंगे स्वदेशी सेल का गणित कुछ ऐसा है कि यह सब्सिडी अब नाकाफी लग रही है।
पैनल की कीमतें इतनी अधिक बढ़ गई हैं कि 78 हजार रुपये की सरकारी छूट मिलने के बाद भी उपभोक्ता को कोई खास आर्थिक लाभ नहीं हो रहा है। इसके चलते कई स्मार्ट उपभोक्ता अब सब्सिडी का मोह छोड़कर नॉन-डीसीआर (Non-DCR यानी विदेशी) पैनल लगवाने का मन बना रहे हैं। बिना सब्सिडी के भी नॉन-डीसीआर पैनल लगवाना उन्हें लॉन्ग टर्म में और इंस्टॉलेशन के समय ज्यादा सस्ता पड़ रहा है।
पीएम सूर्य घर योजना और राजस्थान का हाल: 2 लाख आवेदन पेंडिंग
फरवरी 2024 में केंद्र सरकार ने 'पीएम सूर्य घर योजना' को बड़े जोर-शोर से लॉन्च किया था। इसके तुरंत बाद राजस्थान की राज्य सरकार ने भी एक बड़ी पहल करते हुए, इस योजना के तहत सोलर पैनल लगवाने वालों को 100 यूनिट फ्री बिजली देने की योजना लागू की थी।
राजस्थान सरकार ने एक बड़ा लक्ष्य तय किया था: अगले दो साल में राज्य के 5 लाख घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाए जाएंगे, जिससे 1500 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा। यह योजना आम आदमी के लिए किसी वरदान से कम नहीं थी। लेकिन सप्लाई में कमी ने इस योजना की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है।
ताजा आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति कुछ इस प्रकार है:
- राजस्थान में इस योजना का लाभ उठाने के लिए अब तक लगभग 4.15 लाख आवेदन प्राप्त हो चुके हैं।
- लेकिन स्वदेशी पैनल की मार्केट में कमी के कारण अब तक केवल 2.15 लाख घरों में ही प्लांट इंस्टॉल हो सके हैं।
- शेष 2 लाख आवेदन अभी भी पेंडिंग हैं और लोग महीनों से अपने घरों पर सोलर पैनल लगने का इंतजार कर रहे हैं। वेंडर्स के पास माल ही उपलब्ध नहीं है।
मांग और आपूर्ति (Demand & Supply) का खेल: डिमांड 50 गीगावाट, उत्पादन आधा
पूरे सोलर बाजार में इस वक्त जो उथल-पुथल मची है, उसका मुख्य कारण मांग और आपूर्ति (Demand and Supply) के बीच का बहुत बड़ा अंतर है। भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, हमारे देश में सालाना लगभग 50 गीगावाट (GW) क्षमता के सोलर पैनल की डिमांड है। लेकिन वर्तमान में हमारे देश के अंदर स्वदेशी पैनल (DCR) का सालाना उत्पादन मात्र 20 से 25 गीगावाट तक ही हो पा रहा है।
पहले जब बाजार में नॉन-डीसीआर (Non-DCR) पैनल लगाने की अनुमति थी, तब बाजार में चीन (China) का पूरी तरह से दबदबा था। वहां से आने वाले सस्ते और अधिक मात्रा में उपलब्ध सोलर सेल भारतीय बाजार की जरूरतों को पूरा कर रहे थे। सरकार ने इस चीनी दबदबे को रोकने और भारतीय उत्पादकों को मजबूत करने के लिए ही डीसीआर पैनल की अनिवार्यता लागू की थी। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हमारी घरेलू उत्पादन क्षमता अभी इतनी विशाल मांग को पूरा करने के लिए तैयार ही नहीं है।
भारत में डीसीआर (DCR) सेल बनाने वाली प्रमुख 5 कंपनियां
मार्केट में डीसीआर पैनल की शॉर्टेज (कमी) का एक बड़ा कारण यह भी है कि देश में चुनिंदा कंपनियां ही इनका निर्माण कर रही हैं। वर्तमान में मुख्य रूप से केवल पांच बड़ी कंपनियां ही स्वदेशी सेल बनाने का काम कर रही हैं:
- अडानी (Adani)
- वारी एनर्जीज (Waaree Energies)
- टाटा पावर (Tata Power)
- एमवी (Emmvee)
- विक्रम सोलर (Vikram Solar)
कम उत्पादन और अचानक बढ़ी मांग के कारण हालत यह हो गई है कि वेंडर्स और उपभोक्ताओं को सोलर पैनल के लिए 8 से 10 माह तक की वेटिंग का सामना करना पड़ रहा है।
कमर्शियल और इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स का भविष्य क्या होगा?
चिंता की बात सिर्फ घरों की छतों तक सीमित नहीं है। अब कमर्शियल और इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स में भी डीसीआर पैनल लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके कारण शुरुआती दौर में कई लोग और व्यापारी कुछ दिनों के लिए सोलर लगवाने से बचेंगे और बाजार के सामान्य होने का इंतजार करेंगे।
लेकिन उद्योगों में बिजली की खपत बहुत ज्यादा होती है, इसलिए उन्हें आज नहीं तो कल सोलर की तरफ जाना ही होगा। जैसे ही कमर्शियल और इंडस्ट्रियल क्षेत्र में सोलर पैनल लगाने का काम जोर पकड़ेगा, बाजार में स्वदेशी पैनल (DCR) की मांग अचानक और तेजी से बढ़ जाएगी। चूंकि अभी ही उत्पादन मांग से आधा है, ऐसे में भविष्य में पैनल की भारी कमी आ सकती है, जिससे कीमतें और अधिक आसमान छू सकती हैं।
निष्कर्ष (Conclusion): आगे की राह क्या है?
यह बात सच है कि 'आत्मनिर्भर भारत' के तहत घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देना और विदेशी निर्भरता को खत्म करना एक शानदार और जरूरी कदम है। लेकिन किसी भी नीति को लागू करने से पहले देश की घरेलू उत्पादन क्षमता को मजबूत करना आवश्यक है।
यदि डीसीआर पैनल की कीमतें ऐसे ही 31-32 रुपये प्रति वॉट के स्तर पर रहीं और लोगों को 10-10 महीने इंतजार करना पड़ा, तो 'पीएम सूर्य घर योजना' जैसी शानदार और जन-कल्याणकारी योजनाएं अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाएंगी। सरकार को चाहिए कि वह घरेलू मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स को ज्यादा से ज्यादा प्रोत्साहन और वित्तीय सहायता दे ताकि नई कंपनियां बाजार में आएं। जब उत्पादन बढ़ेगा, तो बाजार में प्रतिस्पर्धा आएगी और अंततः कीमतें अंतर्राष्ट्रीय बाजार के स्तर (15-20 रुपये) तक आ सकेंगी।
फिलहाल, एक आम उपभोक्ता के रूप में आपको यह कैलकुलेट करना होगा कि क्या सब्सिडी का इंतजार करना फायदेमंद है, या बिना सब्सिडी के सस्ते नॉन-डीसीआर (विदेशी) पैनल लगाकर आज से ही अपनी बिजली का बिल बचाना शुरू करना ज्यादा समझदारी का सौदा है।
